■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

• इंजीनियर सुनील कुमार बाजपेयी के मुक्तक संग्रह जो उमड़ा सो बरसा पर कुछ लिखने के पहले यह बताना आवश्यक है कि वाजपेयी जी के लेखन की विधाएं- गीत, छंद, गजल, कहानी, लेख, व बाल साहित्य है। वे लोक निर्माण विभाग उत्तर प्रदेश में सहायक अभियंता के पद से सेवा निवृत हैं। उनकी प्रकाशित कृतियां हैं- सुवर्ण सरिता, सुवर्ण दोहा मंजरी, सुवर्ण कुंडलिया, प्रणम्य साहित्यिक विभूतियां, प्रणम्य बैसवारा, अंतस की अनुभूति, शाश्वत भाव प्रवाह, बीते तीन प्रहर तथा मैं शाश्वत सत्य सनातन हूं। ‘जो उमड़ा सो बरसा’ में कुल 389 मुक्तक शामिल हैं।
कवि का एक मुक्तक देखें-
हम समाज का सच लिखते हैं,
जैसे हैं वैसे दिखते हैं।
हम साहित्य धर्म के साधक,
हैं अनमोल, नहीं बिकते हैं।।
एक और मुक्तक है-
हकीकत से मुंह चुराना नहीं भाया कभी मुझको,
दिखावा करना भी शायद नहीं आया कभी मुझको।
मैं जैसा हूं जहां पर हूं मुझे संतोष है उस पर,
विकृतियों ने जमाने की न भरमाया कभी मुझको।।
‘जो उमड़ा सो बरसा’ का प्रकाशन सतरंग प्रकाशन, लखनऊ द्वारा किया गया है। 104 पृष्ठों की इस कृति के हार्ड बाउंड संस्करण का मूल्य 300 रुपए है। ध्यान रहे कि मुक्तक शब्द का अर्थ है अपने आप में संपूर्ण होना इसलिए मुक्तक काव्य की वह विधा है जिसमें छन्दबद्धरचना अनिवार्य होती है तथा वह अपने आप में पूरी बात रखने में समर्थ होता है। साहित्यकार बाजपेयी ने इस कृति में मुक्तक की तकनीकी विशेषताओं का कायदे से ध्यान रखा है। विभिन्न विषयों पर उत्तम मुक्तकों का सृजन उनकी खासियत है।
पुस्तक में मुक्तकों का क्रम इस प्रकार है- शारदे तू वर दे, अपना स्वयं नियंता हूं, मां, पिता, बेटियां, रिश्ते, कवि- कविता, मोदी, नेता, संगठन, दीप पर्व, होली, हिंदी, गांव, अध्यात्म, दर्शन, नैतिक, राष्ट्रवाद, राष्ट्र भक्त शर्मिंदा हैं, हम नमन करते हैं, विसंगतियां, अच्छा लगता है, आव्हान, प्रकृति, कोरोना, अंधविश्वास, श्रृंगार, हास्य व विविध। इससे लगता है कि कवि ने जीवन व समाज के लगभग सभी पहलुओं को अपने मुक्तकों के जरिए कलात्मक ढंग से छुआ है।
पुस्तक का पहला मुक्तक है-
शारदे हे मातु वर दे दे, नित नवल सुविचार दे दे,
भावनाएं हों परिष्कृत, ज्ञान का विस्तार दे दे।
आ विराजो लेखनी में, स्वर्ग से आकर जमी में,
अंक में ले करके मुझको, मातु जैसा प्यार दे दे।।
कवि- कविता के तहत कवि के मुक्तक की कलात्मक विशेषताएं देखें-
कविता कवि की परिणीता है,
काव्य सुधा रस कवि पीता है।
रात दिवस सोते या जगते,
कवि कविता में ही जीता है।।
उनका एक अन्य मुक्तक उल्लेखनीय है-
मैं सृजन की पुण्य धारा में नहाना चाहता हूं,
काव्य की स्निग्ध सरिता को बहाना चाहता हूं।
दे दुखी मन को दिलासा, काव्य हो ऐसा सरस,
सर्व हित का धर्म मैं कुछ, यूं निभाना चाहता हूं।।
कोरोना के बारे में बाजपेयी जी लिखते हैं-
गमों के यह घेरे हटेंगे कभी तो,
निराशा के बादल छटेंगे कभी तो।
आशा का सूरज क्षितिज पर उगेगा, उदासी भरे दिन कटेंगे कभी तो।।
‘जो उमड़ा सो बरसा’ के मुक्तकों की भाषा एकदम सरल सहज सुगम है। यह पाठकों और श्रोताओं को सम्मोहित कर देती है। डॉ गोपाल नारायण श्रीवास्तव ने एकदम सही लिखा है कि, “सुनील कुमार बाजपेयी जी कविता के चतुर किसान हैं। उन्हें आसमान का मिजाज पढ़ना आता है। धाराधार की प्रकृति उनकी अनुगामी है। कविता के वह सच्चे धरतीपुत्र हैं। ‘जो उमड़ा सो बरसा’ इस सत्य का प्रमाणिक दस्तावेज है।” कुल मिलाकर मुक्तक प्रेमियों को यह कृति अवश्य पसन्द आएगी।
