■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक नगर में आरव नाम का युवक रहता था। वह एक साधारण परिवार से था, लेकिन उसके भीतर कुछ बड़ा करने की तीव्र इच्छा थी। उसने कई बार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की, पर हर बार असफलता ही हाथ लगी। लगातार असफल होने के कारण उसके मन में निराशा घर करने लगी।
एक दिन उसने तय किया कि अब वह सब छोड़ देगा। उसी शाम वह पास के एक पार्क में बैठा था। तभी उसकी नजर एक छोटे से बच्चे पर पड़ी, जो साइकिल चलाना सीख रहा था। बच्चा बार-बार गिरता, चोट लगती, लेकिन वह फिर उठकर कोशिश करता। कुछ देर बाद वह संतुलन बनाकर साइकिल चलाने लगा। उसके चेहरे की खुशी देखने लायक थी।
यह दृश्य आरव के मन को छू गया। उसने सोचा, जब यह छोटा बच्चा गिरकर भी हार नहीं मानता, तो मैं क्यों हार मानूं?’ उसी क्षण उसने खुद से वादा किया कि वह एक बार फिर पूरी मेहनत से प्रयास करेगा।
आरव ने अपनी कमजोरियों को पहचाना, पढ़ाई का तरीका बदला और पूरी लगन से तैयारी में जुट गया। इस बार उसने केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि सही दिशा में मेहनत की। कुछ महीनों बाद परीक्षा का परिणाम आया और इस बार वह सफल हो गया।
उसकी सफलता ने यह साबित कर दिया कि असफलता अंत नहीं होती, बल्कि एक नई शुरुआत का संकेत होती है।
● संदेश: जीवन में गिरना गलत नहीं, गिरकर उठना छोड़ देना गलत है। जो व्यक्ति हर हार के बाद खुद को संभाल लेता है, वही असली विजेता बनता है।
