■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

उत्तराखंड की अप्रतिम श्रम संस्कृति के प्रेरक प्रतीक जाने माने हिंदी प्रेमी, कवि, लेखक, पत्रकार, छात्र नेता तथा सुविख्यात एन एल पी ट्रेनर व मोटिवेशनल स्पीकर गिरिधर बलोधी के व्यक्तित्व व कृतित्व पर आधारित ग्रँथ योद्धा गिरिधर के संपादक डॉ रवींद्र कात्यायन ने संपादकीय में लिखा है कि, “किस तरह एक ग्रामीण पहाड़ी परिवार अभावों और मुफलिसी के चलते शहर की ओर पलायन करने पर विवश होता है। नाजुक उम्र, जिस किशोरावस्था में पढ़ाई के साथ मौज मस्ती होनी थी, उस अवस्था में बॉयलर सूट पहनकर फैक्ट्री में नौकरी करने की विवशता। आखिर ऐसा क्या था इस शख्स में, जो मुफलिसी, विषमता, सम्बन्धों के दंश, मारक परिस्थितियों के थपेड़ों एवं असाध्य शारीरिक व्याधियों की मर्मान्तक पीड़ा को झेलते हुए भी न बिखरता है और न निराशा और हताशा की धुंध में गुम होता है। बल्कि जीवन में आई हर चुनौती और हरेक बाधा को पार करते हुए आगे ही बढ़ता जाता है। श्रमिक, लेखक, शिक्षक, प्रशासक और प्रबंधक की भूमिकाओं को वह मात्र जीता ही नहीं है, बल्कि प्रदत्त सभी दायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए परिवार को भी उन्नत और समृद्ध बनाता है।… उम्र के इस पड़ाव पर भी बलोधी जी की सक्रियता चकित करती है।”
“योद्धा गिरिधर” की भावभूमि उत्तराखंड की अद्भुत पारिवारिक, सामाजिक, ऐतिहासिक व सांस्कृतिक परंपरा है, लिहाजा मुंबई के उत्तराखंडी समाज के प्रति बलोधी जी की तड़प को भीष्म कुकरेती ने याद किया है। डॉ देवेश ठाकुर की राय में बलोधी जैसा संकल्पित व्यक्ति ही शून्य से शिखर तक पहुंचता है। प्रो राधा बल्लभ डोभाल के मुताबिक वह महाराष्ट्र में हिंदी अकादमी की मांग करने वाले पहले हिंदी सेवी हैं। केशर सिंह बिष्ट उन्हें विपरीत हालात में जूझने का जज्बा कहते हैं, डॉ रवींद्र कुमार कोटनाला के शब्दों में हर खुशी को सेलिब्रेट करना उनकी आदत तो कुसुमलता गुसांई याद करती हैं कि उस दौर में उत्तराखंडी समाज का “पाय- पायपर” युवा गिरिधर को माना जाता था। भुवनेंद्र सिंह बिष्ट के आत्म संस्मरण का शीर्षक है- गिरिधर की वाणी जैसे तपस्वी साधक की वाणी है और इस वाणी में अनहद बोलता है। हरि मृदुल के अनुसार भारतीय साहित्य से लेकर विश्व साहित्य के वे अध्येता हैं। बलोधी और उत्तराखंड के रिश्ते पर विजया पंत तुली, पूर्ण चंद बलोदी, संजय बलोदी प्रखर, विनोद बलोदी, डॉ योगेश्वर शर्मा धस्माना, आनंद बलोधी, सतीश मोलासी ने भी बेहद मार्मिक ढंग से कलम चलाई है।
आमतौर पर इस तरह के ग्रँथ में परिवार के सदस्यों व रिश्तेदारों की भरमार रहती है पर इस अनूठे ग्रंथ में परिवार के लोग बेहद कम है। 60 लेखकों में परिवार लोग मुश्किल से 6 या 7 हैं। बाकी सब बलोधी जी के करियर व समाजसेवा से जुड़े इंसान हैं। बलोधी जी एक बड़ी सरकारी बीमा कंपनी में भी उच्च पदस्थ अधिकारी रहे हैं। उनका ये कार्यकाल विकास श्रीवास्तव, डॉ देवेंद्र कुमार मिश्र, राजेंद्र प्रसाद कांडपाल, स्वाति अग्रवाल, कृष्णा वशिष्ट, दिलीप सोनावणे, किशोर मोहिते, देवेन्द्र शुक्ल ने अपनी लेखनी व यादों से जीवंत किया है।
“योद्धा गिरिधर” की जीवन यात्रा को अगर हम देखें तो उसमें भी उत्तराखंडी माटी की प्रतिबद्धता व खुशबू के दर्शन होते हैं। उनका जन्म 8 जनवरी, 1956 को ग्राम कोटनाली, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड में हुआ।
बाल्यावस्था से ही मुफलिसी, अभाव, शारीरिक चुनौतियां, भावनात्मक आघात, असंतुलित रिश्ते और उनसे उपजा दंश निरंतर त्रास देकर उन्हें मरणासन्न करता रहा किन्तु तब से अब तक मारक परिस्थितियों, बाधाओं व चुनौतियों से निरंतर लड़ते आये हैं – एक योद्धा की तरह ! कभी हार नहीं मानी, न परिस्थितियों से न भाग्य से न व्यवस्था से और न बेहद कष्टदायक बीमारी से। महज 13 साल की किशोरावस्था में स्कूली पढ़ाई जारी रखने के लिए बच्चों को ट्यूशन देकर चार पैसे कमाने लगे। उम्र जब 16 साल हुई तो जीवन के इस बसंत काल में मुम्बई के इंडस्ट्रियल एरिया में बतौर श्रमिक काम करने लगे। एक नौकरी दूसरी नौकरी। फिर पत्रकारिता निर्भय पथिक में, अध्यापन बॉम्बे इंटरनॅशनल स्कूल लेक्चरर एम. टी. एस खालसा जूनियर कॉलेज में अंततः 13 वीं नौकरी ज्वाइन की भारत सरकार की बहुराष्ट्रीय जनरल इन्सुरेंस कंपनी न्यू इन्डिया एस्योरन्स कंपनी लिमिटेड में बतौर प्रशासनिक अधिकारी और प्रबंधक पद पर उत्कृष्ट कार्य करते हुए सम्मानित हुए। और अब एनएलपी ट्रेनर, लाइफ कोच, मोटिवेशनल स्पीकर की प्रभावशाली भूमिका में हैं। बेहतर मानवीय समाज का निर्माण, सकारात्मक और उद्देश्य पूर्ण जीवन जीने की इस मुहिम में 20 हजार से अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षण देकर लाभान्वित कर चुके हैं।
अब फिर “योद्धा गिरिधर” पर वापस लौटते हैं। डॉ जवाहर कर्णावत ने सही लिखा है कि बलोधी जी कॉलेज के दिनों से ही हिंदी के गौरव के लिए काम करते रहे हैं। अश्विनी कुमार मिश्र कहते हैं कि उनकी कई खबरों ने मुंबई में हलचल मचा दी थी। विभा रानी को उनके प्रशिक्षण में थिएट्रिकल जेस्चर दिखता है तो आचार्य पवन त्रिपाठी उन्हें एनएलपी को सरल, सहज व सुगम बनाने वाले की संज्ञा देते हैं। शिवेंद्र प्रकाश द्विवेदी उन्हें सच्चे कर्मवीर योद्धा तो संतोष श्रीवास्तव आदर्श शिक्षक की उपमा देते हैं। संजीव निगम को इस बात का ताज्जुब है कि बलोधी जी एक व्यक्ति हैं या फिर कोई चलती फिरती कम्पनी।
डी एस द्विवेदी के अनुसार वे अपने उपनाम में निहित बल और बुद्धि को सार्थकता प्रदान करते हैं।
“योद्धा गिरिधर” के 252 पृष्ठों में 60 विभूतियों के विचार व संस्मरण हैं। जिनमें प्रेम शुक्ल, डा अनंत श्रीमाली, अनिल मिश्र, ईश्वरी दत्त भारद्वाज, आरती राय, चंद्रकांता दत्ता, डॉ राजेश्वर उनियाल, डॉ मधु नायर, अर्जुन कुंभार जैसे सुविख्यात व्यक्तित्व हैं। इन सभी की कलम ने ये दर्शाया है कि बलोधी जी ने निरन्तर कठिन परिश्रम, प्रतिबद्धता, लगन व समर्पण भाव से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अद्भुत कामयाबी प्राप्त की है। और उनकी यह यात्रा अनवरत जारी है। एक निर्भीक पथिक की भांति, एक योद्धा की तरह। संवेदनशील, सरल, अप्रोचेबल, जमीन से जुड़े, पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते दो उच्च शिक्षित विवाहित बेटियों के पिता। शिक्षिका उषा के पति गिरिधर बलोधी पर आधारित ग्रँथ “योद्धा गिरिधर” एक अद्भुत उपहार है। इसे परिदृश्य प्रकाशन मुंबई ने प्रकाशित किया है। इसकी कीमत 495 रुपए है।
