■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा, “बीरबल! मैंने सुना है कि भगवान विष्णु एक हाथी की जान बचाने के लिए स्वयं आए थे।”
बीरबल ने कहा, “जी महाराज! वह हाथी भगवान विष्णु का भक्त था। एक दिन जब वह नदी से पानी पी रहा था, तभी एक मगरमच्छ ने उसे पकड़ लिया। संकट में पड़े हाथी ने भगवान विष्णु को पुकारा, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए आए और मगर का वध कर दिया।”
अकबर ने पूछा, “लेकिन इसके लिए भगवान को स्वयं आने की क्या आवश्यकता थी? वे तो किसी को आदेश देकर भी यह कार्य कर सकते थे।”
बीरबल बोले, “हुजूर, इसका उत्तर मैं आपको कुछ दिन बाद दूँगा।”
कुछ समय बाद दरबारियों ने यमुना नदी में नौकाविहार की योजना बनाई। अकबर, उनके सेनापति, अंगरक्षक और अन्य दरबारी अलग-अलग नावों में सवार होकर नदी में निकल पड़े।
अचानक पानी में छपाक की आवाज हुई और किसी ने चिल्लाकर कहा, “शहजादे सलीम नदी में गिर गए!” यह सुनते ही अकबर ने बिना देर किए नदी में छलांग लगा दी और डूबते हुए शहजादे को पकड़ लिया। परंतु जब उन्होंने ध्यान से देखा, तो वह मोम का पुतला था।
अकबर क्रोधित हो उठे, “यह क्या मजाक है? शहजादा सलीम कहाँ है?”
सभी दरबारी सिर झुकाए खड़े थे, केवल बीरबल मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने सलीम को पीछे से आगे लाते हुए कहा, “महाराज, शहजादे सुरक्षित हैं।”
फिर बीरबल बोले, “महाराज, आपने मुझसे एक प्रश्न किया था। आज मैं आपसे पूछता हूँ, जब आपने सुना कि शहजादा नदी में गिर गए हैं, तो आप स्वयं क्यों कूद पड़े? आप किसी को आदेश भी दे सकते थे।”
अकबर को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
सच तो यह है कि इंसान हो या भगवान, जिससे सच्चा प्रेम होता है, उसके लिए वह स्वयं दौड़ पड़ता है, किसी और को आदेश नहीं देता।
