■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक खचाखच भरी बस में कंडक्टर को एक गिरा हुआ बटुआ मिला, जिसमें एक पाँच सौ का नोट और भगवान कृष्ण की एक फोटो थी।
वह जोर से चिल्लाया, “अरे भाई! किसी का बटुआ गिरा है क्या?”
अपनी जेबें टटोलने के बाद सीनियर सिटीजन सीट पर बैठा एक आदमी बोला, “हाँ बेटा, शायद वह मेरा बटुआ होगा… ज़रा दिखाना तो।”
“दिखा दूँगा, लेकिन चाचाजी पहले यह तो बताइए कि इसके अंदर क्या-क्या है?”
“कुछ नहीं, इसके अंदर थोड़े पैसे हैं और मेरे कृष्ण की एक फोटो है,” चाचाजी ने जवाब दिया।
“पर कृष्ण की फोटो तो किसी के भी बटुए में हो सकती है, मैं कैसे मान लूँ कि यह आपका है?” कंडक्टर ने सवाल किया।
अब चाचाजी उसके बगल में बैठ गए और बोले, “बेटा, यह बटुआ तब का है जब मैं हाई स्कूल में था। जब मेरे बाबूजी ने मुझे यह दिया था, तब इसमें कृष्ण की फोटो थी।
लेकिन मुझे लगा कि मेरे माँ-बाप ही मेरे लिए सब कुछ हैं, इसलिए मैंने कृष्ण की फोटो के ऊपर उनकी फोटो लगा दी…
जब युवा हुआ तो लगा कि मैं कितना हैंडसम हूँ, और मैंने माँ-बाप की फोटो के ऊपर अपनी फोटो लगा ली…
फिर मुझे एक लड़की से प्यार हो गया। लगा वही मेरी दुनिया है, वही मेरे लिए सब कुछ है, और मैंने अपनी फोटो के साथ-साथ उसकी फोटो लगा ली… सौभाग्य से हमारी शादी भी हो गई। कुछ दिनों बाद मेरे बेटे का जन्म हुआ। इतना खुश मैं पहले कभी नहीं हुआ था… सुबह-शाम, दिन-रात मुझे बस अपने बेटे का ही ख़याल रहता था…
अब इस बटुए में मैंने सबसे ऊपर अपने बेटे की फोटो लगा ली…
पर अब जगह कम पड़ रही थी, सो मैंने कृष्ण और अपने माँ-बाप की फोटो निकालकर बक्से में रख दी…
और विधि का विधान देखो, फोटो निकालने के दो-चार साल बाद माता-पिता का देहांत हो गया… और दुर्भाग्यवश उनके बाद मेरी पत्नी भी एक लंबी बीमारी के बाद मुझे छोड़कर चली गई…
इधर बेटा बड़ा हो गया था, उसकी नौकरी लग गई, शादी हो गई… बहू-बेटे को अब यह घर छोटा लगने लगा। उन्होंने अपार्टमेंट में एक फ्लैट ले लिया और वहाँ चले गए…
अब मैं अपने उस घर में बिल्कुल अकेला था, जहाँ मैंने तमाम रिश्तों को जीते-मरते देखा था…
पर पता है, जिस दिन मेरा बेटा मुझे छोड़कर गया, उस दिन मैं बहुत रोया… इतना दुःख मुझे पहले कभी नहीं हुआ था… कुछ समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। तभी मेरी नज़र उस बक्से पर पड़ी, जिसमें सालों पहले मैंने कृष्ण की फोटो अपने बटुए से निकालकर रख दी थी…
मैंने फ़ौरन वह फोटो निकाली और उसे अपने सीने से चिपका ली… एक अजीब सी शांति महसूस हुई… लगा कि मेरे जीवन में तमाम रिश्ते जुड़े और टूटे, लेकिन इन सबके बीच मेरे भगवान से मेरा रिश्ता अटूट रहा… मेरा कृष्ण कभी मुझसे रूठा नहीं…
और तब से इस बटुए में सिर्फ मेरे कृष्ण की फोटो है, और किसी की भी नहीं… और मुझे इस बटुए और उसमें पड़े पाँच सौ के नोट से कोई मतलब नहीं है। मेरा स्टॉप आने वाला है… तुम बस बटुए की फोटो मुझे दे दो… मेरा कृष्ण मुझे दे दो।”
कंडक्टर ने फ़ौरन बटुआ चाचाजी के हाथ में रखा और उन्हें एकटक देखता रह गया…!
