■ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

• युवा कवि, कथाकार व शिक्षक तथा पर्यावरण प्रेमी प्रदीप कुमार तिवारी अर्थात प्रदीप ‘पांथ’ मुसाफिरखाना, अमेठी के निवासी हैं। उनके प्रबंध काव्य “माधव तुम कब आओगे” को समीर कुलश्रेष्ठ ने ‘संवेदनाओं की आत्मिक अनुभूति’, कर्मराज शर्मा ‘तुकांत’ ने ‘युग- चेतना का उद्घोष’, पुष्कर सुल्तानपुरी ने ‘कविता के आईने में समाज’, डॉ अरुण कुमार आर्य ने ‘माधव के पुनः अवतरण की अभिलाषा’ तथा अभिमन्यु शुक्ल ‘तरंग: ने ‘काव्य की प्रत्येक कड़ी यथार्थ का दर्पण’ लिखा है। वैसे कवि प्रदीप ‘पांथ’ की राय में, “यह कृति उन सभी प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास है, जो वर्तमान समय में मानवीय मूल्यों के जीवन-नेपथ्य में गुम हो जाने से उत्पन्न होते हैं। इसमें मैंने अपने हृदय नाद को ही नहीं, अपितु युग की सामूहिक वेदना को भी शब्द बद्ध करने का प्रयास किया है। अपने प्रत्येक सर्ग में यह रचना पूँछती है कि जब अंधकार प्रकाश का उपहास करने लगे और तमाशा ही जीवन का धर्म बन जाये तो कौन शारंग उठाएगा। इस कृति में जहाँ ‘माधव’ मनुष्य के अंदर का सुसुप्त ईश्वरत्व है, वहीं ‘शारंग’ आत्मा का वह शस्त्र है जो रजोगुण और तमोगुण को विजित कर सतोगुण को पुनर्स्थापित कर सकता है। सत्य, विवेक और साहस का प्रतीक शारंग वह चैतन्य है जो निष्क्रियता को भंग कर हमें सच्चा कर्म योगी बना सकता है।”
• ‘माधव तुम कब आओगे?’ में सब कुछ है। भाषा, बोली, शिक्षा प्रेम, भक्ति, दया, करुणा, ईमानदारी, कर्तव्य, सहिष्णुता, सदाचार, सहयोग, सद्भाव, न्याय, मित्रता, परिवार, सहानुभूति, शांति, अहिंसा, सत्यनिष्ठा, स्वधर्म, सत्यवादिता, परोपकार, संस्कार, सत्यानुशीलन, स्वाभ्यास, स्वाध्याय, नैतिकता, सद्विचार, सद्गुण, साहचर्य, के साथ नुक्कड़, हाट, आँवा, कहार, दमड़ी, काठ- कठौती है। रोमांस व पंथ निरपेक्षता है, वसुधैव कुटुम्बकम भाव है और समस्त बुराइयों पर प्रहार है। यानी कि यह कृति संपूर्ण मानवता के कल्याण की कामना करती है।
● इसकी पहली कड़ी में कवि का पर्यवेक्षण देखिए-
अजब समय है अंधियारे में, उड़गन सभा लगाते हैं।
सिंहासन पर चांद बिठाकर, सूरज सम बतलाते हैं।।
झुठलाते हैं सबको कहकर, तम का कहां बसेरा है।
देख धरा पर हर घर आंगन, चन्द्र प्रभा का डेरा है।
भ्रम में हैं खद्योत सभी वे, जग रोशन कर सकते हैं।
उड़गन चन्द्र सरीखे तो वे भी टिमटिम कर सकते हैं।
सूरज नहीं निडर उसको भी, राहु केतु का खटका है।
अँधियारी गलियों में जाकर, वह भी अब तो भटका है।
इन्हें मार्ग दिखलाने खातिर, माधव तुम कब आओगे?
सिर्फ तमाशा देखोगे या शारंग कभी उठाओगे।
प्रस्तुत कृति काव्य तकनीक पर भी खरी उतरती है। हरेक पृष्ठ पर नीचे महत्वपूर्ण शब्दो के अर्थ दिए गए हैं।
• कृति की 57 वीं कड़ी में सर्व धर्म समभाव को कवि ने वरीयता दी है-
सर्व धर्म सम भाव सूत्र धर, सहचर संगत चलना है।
पंथ रहे निरपेक्ष साथ ही, धर्म पथिक भी बनना है।
विरत धर्म हो कर्म पथिक तो, जीवन पथ पर रोता है।
कथित पंथ निरपेक्ष जरूरी, संवासन को होता है।
बहुलवाद की धारा माझी, नौका ले जब चलता है।
प्रश्न संतुलन का तब उसके, मन को बहुत अखरता है।
एकमेव मत बहुलवाद में, कहाँ किसी को भाता है।
राज्य विषय हित बात चले तो, प्रश्न उलझ ही जाता है।
• कवि ने “माधव तुम कब आओगे” को 101 वीं कड़ी में विराम कुछ इस तरह से- एक अप्रतिम शुभ संकल्प के साथ, दिया है-
शमित द्वंद जब मन कुरुक्षेत्र, शुभ संकल्प निखरता है।
जीवन में तब सद्भावों का, झरना निर्झर बहता है।
काम क्रोध मद मोह प्रभंजन, जैसे जैसे थमता है।
वैसे वैसे मन का निष्प्रभ, दीपक फिर से जलता है।
जीवन फेन बिंदु सा जग में, समय फेर सँग उगता है।
धर्म मूल्य अनुप्राणित होकर, सदा अमर रह सकता है।
जनित इंद्रिय विषय भोग सुख, स्वत्यायन जो करता है।
कल्पित मुक्ति मार्ग पर केवल, वही कदम रख सकता है।
• कवि प्रदीप पांथ ने माधव तुम कब आओगे? को जन सामान्य के लिए उपयोगी कृति बना दिया है। इसमें लिखी बातों का अनुसरण कर जीवन को सुखमय बनाया जा सकता है। पुस्तक के अंत में परिशिष्ट शब्द प्रकाश में धर्म के दस लक्षण, दक्ष की 13 पुत्रियां, अष्ट आत्मगुण, दस पारमिताएं, दस वायु, धर्म के दस गुणात्मक स्वरूप, त्रिक सिद्धांत, त्रिगुण के साथ चित्तवृत्ति, मरुत, प्राणवायु की विवेचना की गई है। पुस्तक हिंदी श्री पब्लिकेशन, भदोही, उत्तरप्रदेश ने किया है। सुरेंद्र प्रजापति का आवरण आकर्षक है। 128 पृष्ठों की इस पेपर बैक पुस्तक का मूल्य 250 रुपए है।
