■ सूर्यकांत उपाध्याय

कुछ लोग हमेशा उलटा ही चलते हैं। यह ऐसी ही एक स्त्री की कहानी है।
रामू अपनी पत्नी से बहुत परेशान था, क्योंकि वह उसकी हर बात का उलटा ही करती थी। रामू खाना माँगता तो वह कहती, आज हम व्रत रखेंगे। और जब रामू कहता कि आज भूख नहीं है, तो वह ज़बरदस्ती उसके मुँह में खाना ठूँस देती।
एक बार गुरुजी आए तो रामू ने रोते-रोते अपनी सारी व्यथा उन्हें बताई। गुरुजी बोले, “ऐसा किया करो, जैसा मन हो, उससे उलटा ही कहा करो।”
अब रामू को रास्ता मिल गया। वह ऐसा ही करने लगा और कुछ समय तक सुख से रहने लगा।
एक दिन रामू अपनी पत्नी के साथ तीर्थ स्नान के लिए गया। वहाँ बहुत भीड़ थी। उसकी पत्नी जल्दी-जल्दी नदी में उतरने लगी। हड़बड़ी में रामू गुरुजी का नुस्खा भूल गया और कह बैठा, “आगे मत जाना, फिसल जाओगी।”
पत्नी ने बात नहीं मानी। वह आगे बढ़ी और फिसलकर बहाव में बह गई।
रामू चिल्लाया, “गई रे गई! कोई बचाओ!” कुछ साहसी युवक नीचे की ओर दौड़ने लगे। रामू ने देखा तो बोला, “नीचे कहाँ जा रहे हो? ऊपर की तरफ जाओ!”
युवकों ने कहा, “कैसी बात करते हो? यहाँ डूबी है, तो नीचे ही जाएगी।”
रामू बोला,“तुम पानी के बहाव को जानते हो, मेरी पत्नी को नहीं। वह कभी सीधी चली है जो आज चलेगी? वह तो डूबकर भी उलटी ही जाएगी।”
अंततः वह स्त्री डूब गई।
■ शिक्षा: हमारे आसपास भी ऐसे लोग हैं, जो सीधी राह नहीं चलते। संत जो करने को कहते हैं, वे नहीं करते; और जिससे मना किया जाता है, वही बार-बार करते हैं। ऐसे लोगों को इस भवसागर में डूबने से कैसे बचाया जाए?
