■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक समय एक अत्यंत कंजूस सेठ था। वह एक दमड़ी भी किसी को देने को तैयार नहीं होता था। यहाँ तक कि वह अपनी साँसें भी बहुत सोच-समझकर लेता था और उन्हें नियंत्रित करने में उसे बड़ा अनुभव था। यह कंजूस सेठ, दानचंद, भगवान श्रीकृष्ण का भक्त था।
एक दिन वह गंगा घाट पर स्नान करने गया। वहीं भगवान श्रीकृष्ण उसकी परीक्षा लेने के लिए पंडित के वेश में प्रकट हुए। जब सेठ गंगा में डुबकी लगाने गया, तभी पंडित उसके सामने आकर बोले, “यजमान, मुझे कुछ दक्षिणा दे दीजिए।”
सेठ ने तुरंत उत्तर दिया, “मेरे पास अभी कोई धन नहीं है।” तब पंडित ने कहा, “कोई बात नहीं, आप संकल्प कर लीजिए कि आगे चलकर कुछ देंगे।” सेठ ने मन ही मन सोचा कि पंडित को उसका घर तो पता नहीं होगा, इसलिए उसने एक आना देने का संकल्प कर लिया।
स्नान के बाद वह घर आकर सो गया। थोड़ी देर में दरवाजे पर आहट हुई। उसकी पत्नी ने बाहर जाकर देखा तो वही पंडित खड़े थे। उन्होंने कहा, “आपके पति ने मुझे एक आना देने का संकल्प किया था, उनसे कहिए वह दे दें।”
पत्नी ने सेठ को बताया तो वह घबरा गया और बहाना बनाने लगा। पहले उसने कहा कि वह बीमार है, फिर बोला कि कह दो वह मर गया है। पत्नी ने मजबूरी में यही बात पंडित से कह दी।
पंडित ने पूरे गाँव में खबर फैला दी। लोग इकट्ठा हो गए और सेठ को मृत मानकर अंतिम यात्रा की तैयारी करने लगे। सेठ अपनी साँसें रोककर लेटा रहा।
तभी पंडित ने उसके कान में कहा, “आँखें खोलो, मैं स्वयं भगवान हूँ, जो माँगना है माँग लो।” सेठ ने आँखें खोलीं, पर उसकी कंजूसी नहीं गई। उसने कहा, “मुझे कुछ नहीं चाहिए, मैं तो अपना संकल्प वापस लेना चाहता हूँ।”
भगवान मुस्कुराए और बोले, “तथास्तु।”
