■ सूर्यकांत उपाध्याय

“पापा-पापा, मुझे चोट लग गई… खून आ रहा है!”
5 साल के बच्चे के मुंह से इतना सुनते ही पापा सब कुछ छोड़-छाड़कर उसे गोद में उठाकर एक किलोमीटर दूर क्लिनिक तक दौड़ते हुए पहुंच गए।
दुकान, कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आए।
सीधे डॉक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए बोले,
“देखिए-देखिए डॉक्टर, मेरे बेटे को क्या हो गया!”
डॉक्टर साहब ने देखते हुए कहा,
“अरे भाई साहब, घबराने की कोई बात नहीं है, मामूली चोट है… ड्रेसिंग कर दी है, जल्दी ठीक हो जाएगी।”
“डॉक्टर साहब, कुछ पेनकिलर लिख दीजिए, दर्द कम हो जाएगा… अच्छी से अच्छी दवाइयां लिख दीजिए ताकि जल्दी घाव भर जाए।”
डॉक्टर बोले,
“अरे भाई साहब, क्यों इतने चिंतित हो रहे हो? कुछ नहीं हुआ है, 3-4 दिन में ठीक हो जाएगा।”
“पर डॉक्टर साहब, इसको रात में नींद तो आ जाएगी ना?”
“अरे हाँ-हाँ, निश्चिंत रहो।”
बच्चे को लेकर लौटे तो नौकर बोला,
“सेठ जी, आपका तो ब्रांडेड महंगा शर्ट खराब हो गया… खून लग गया, अब ये दाग नहीं निकलेंगे।”
“कोई बात नहीं भाई… ऐसे शर्ट तो बहुत आ जाएंगे। मेरे बेटे का खून बह गया, वही चिंता खाए जा रही है। कहीं कमजोर तो नहीं हो जाएगा? तू एक काम कर—थोड़े सूखे मेवे और फल ले आ, इसे खिलाना पड़ेगा… और दुकान तुम संभाल लेना, मैं घर जा रहा हूं।”
40 साल बाद…
दुकान अब शोरूम में बदल चुकी है।
सेठ जी का बेटा बिज़नेस संभाल रहा है।
सेठ जी रिटायर होकर घर पर ही रहते हैं।
तभी घर से बेटे की पत्नी का फोन आता है-
“अजी सुनते हो, आपके पिताजी पलंग से गिर गए हैं, सिर से खून आ रहा है…”
लड़का कहता है,
“अरे यार, ये पिताजी भी ना… इन्हें बोला था जमीन पर सो जाओ, लेकिन मानते नहीं!”
“अरे रामू काका, जाओ घर पर… पिताजी को डॉक्टर अंकल के पास लेकर आओ, मैं वहीं मिलता हूं।”
बूढ़े रामू काका धीरे-धीरे घर पहुंचते हैं।
तब तक सेठ जी का काफी खून बह चुका होता है।
बहू मुंह बनाकर कहती है,
“जल्दी ले जाओ… पूरा महंगा कालीन खराब हो गया!”
रामू काका जैसे-तैसे सेठ जी को साइकिल रिक्शा में बैठाकर क्लिनिक ले जाते हैं।
बेटा अभी तक नहीं पहुंचा था। फोन करने पर बोला-
“अरे यार, कार की चाबी नहीं मिल रही थी… अभी मिली है। थोड़े कस्टमर भी हैं, आप बैठो, मैं आता हूं।”
जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने बेटे के सिर पर खून देखकर 10 मिनट में दौड़कर तय कर ली थी…
उसी दूरी को बेटा 1 घंटा 10 मिनट में भी कार से तय नहीं कर पाया।
डॉक्टर ने जैसे ही सेठ जी को देखा, तुरंत अंदर ले जाकर इलाज शुरू किया।
तब तक बेटा भी पहुंच गया।
डॉक्टर बोले,
“बेटे, खून बहुत बह गया है… इन्हें एडमिट कर देते तो ठीक रहता।”
बेटा बोला,
“अरे कुछ नहीं डॉक्टर साहब, आप ड्रेसिंग कर दीजिए… 2-4 दिन में ठीक हो जाएंगे।”
डॉक्टर बोले,
“ठीक है, कुछ दवाइयां लिख देता हूं… थोड़ी महंगी हैं, लेकिन आराम जल्दी होगा।”
लड़का बोला,
“अरे डॉक्टर अंकल, चलेगा… 4-5 दिन ज्यादा लग जाएंगे तो क्या हुआ, इतनी महंगी दवाइयों की क्या जरूरत? मुझे निकलना पड़ेगा, शोरूम पर कोई नहीं है।”
यह सुनते ही डॉक्टर के सब्र का बांध टूट गया…
उन्होंने 40 साल पहले की पूरी घटना सुना दी।
बेटे की आंखों से अविरल आंसू बहने लगे।
तभी बहू का फोन आया-
“वो महंगा कालीन खराब हो गया है, क्या करूं?”
बेटा बोला,
“कालीन ही खराब हुआ है ना… नया आ जाएगा। तुम पलंग पर नया चादर और गद्दा डालो, मैं पिताजी को लेकर आ रहा हूं।”
सेठ जी की आंखों में आंसू थे-यह आंसू खुशी के थे।
चोट का दर्द गायब हो चुका था… बेटे के अपनेपन ने सब भुला दिया।
