■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक ब्राह्मण को विवाह के कई वर्षों बाद पुत्र प्राप्त हुआ। लेकिन कुछ ही वर्षों बाद बालक की असमय मृत्यु हो गई।
ब्राह्मण पुत्र का शव लेकर श्मशान पहुंचा। वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था। उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए गए जप-तप और उसके जन्म का उत्सव याद आ रहा था।
श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे। दोनों शव को देखकर प्रसन्न हो गए। उन्होंने आपस में एक व्यवस्था बना रखी थी, दिन में सियार मांस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध।
सियार ने सोचा कि यदि ब्राह्मण दिन में ही शव छोड़कर चला गया, तो उस पर गिद्ध का अधिकार हो जाएगा। इसलिए उसने निश्चय किया कि किसी तरह ब्राह्मण को अंधेरा होने तक बातों में उलझाए रखा जाए।
उधर गिद्ध इस प्रतीक्षा में था कि शव के साथ आए लोग जल्द चले जाएं, ताकि वह उसे खा सके।
गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और वैराग्य की बातें करने लगा।
उसने कहा, “मनुष्यों, आपके दुख का कारण यही मोह-माया है। संसार में आने से पहले प्रत्येक प्राणी की आयु निर्धारित हो जाती है। संयोग और वियोग प्रकृति के नियम हैं।
आप अपने पुत्र को वापस नहीं ला सकते। इसलिए शोक त्यागकर यहां से प्रस्थान करें। संध्या होने वाली है और संध्याकाल में श्मशान भयावह हो जाता है। अतः शीघ्र चले जाना ही उचित है।”
गिद्ध की बातें ब्राह्मण के साथ आए रिश्तेदारों को उचित लगीं। वे ब्राह्मण से बोले, “अब बालक के जीवित होने की कोई आशा नहीं है। यहां रुकने से क्या लाभ?”
सियार यह सब सुन रहा था। उसे लगा कि गिद्ध की चाल सफल हो रही है, इसलिए वह तुरंत ब्राह्मण के पास पहुंचा।
सियार बोला, “आप बड़े निर्दयी हैं। जिससे इतना प्रेम करते थे, उसकी मृत देह के साथ कुछ समय भी नहीं बिता सकते? फिर कभी इसका मुख नहीं देख पाएंगे। कम से कम संध्या तक तो रुककर इसे जी भरकर देख लीजिए।”
लोगों को रोकने के लिए उसने नीति की बातें भी शुरू कर दीं, “जो रोगी हो, जिस पर अभियोग लगा हो और जो श्मशान की ओर जा रहा हो, उसे बंधु-बांधवों के सहारे की आवश्यकता होती है।”
सियार की बातों से परिजनों को कुछ सांत्वना मिली और उन्होंने वापस लौटने का विचार छोड़ दिया।
अब गिद्ध चिंतित हो गया। उसने फिर कहना शुरू किया, “तुम ज्ञानी होकर भी एक कपटी सियार की बातों में आ गए। एक दिन हर प्राणी की यही दशा होनी है। शोक छोड़कर अपने-अपने घर जाओ।
जो उत्पन्न हुआ है, उसका नाश निश्चित है। तुम्हारा शोक मृतक को दूसरे लोक में कष्ट देगा। जो मृत्यु के अधीन हो चुका है, उसे रो-रोकर व्यर्थ कष्ट क्यों देते हो?”
लोग फिर चलने को हुए तो सियार दोबारा बोल पड़ा, “यदि यह बालक जीवित रहता, तो क्या तुम्हारे वंश को आगे नहीं बढ़ाता? कुल का सूर्य अस्त हो गया है। कम से कम सूर्यास्त तक तो रुको।”
अब गिद्ध और अधिक चिंतित हो गया। उसने कहा, “मेरी आयु सौ वर्ष की है। मैंने आज तक किसी मृत व्यक्ति को जीवित होते नहीं देखा। तुम्हें शीघ्र जाकर इसके मोक्ष का कार्य आरंभ करना चाहिए।”
सियार ने फिर कहा, “जब तक सूर्य आकाश में विराजमान हैं, तब तक दैवीय चमत्कार संभव हैं। रात्रि में आसुरी शक्तियां प्रबल हो जाती हैं। इसलिए मेरा सुझाव है कि थोड़ी प्रतीक्षा कर लेनी चाहिए।”
सियार और गिद्ध की चालाकी में फंसा ब्राह्मण परिवार समझ नहीं पा रहा था कि क्या करे। अंततः पिता ने पुत्र का सिर अपनी गोद में रखा और जोर-जोर से विलाप करने लगा। उसके विलाप से पूरा श्मशान गूंज उठा।
उसी समय संध्या भ्रमण पर निकले महादेव और पार्वती वहां पहुंचे। पार्वती जी ने बिलखते परिजनों को देखा तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने महादेव से बालक को जीवित करने का अनुरोध किया।
तब महादेव प्रकट हुए और उन्होंने बालक को सौ वर्ष की आयु प्रदान कर दी। यह देखकर गिद्ध और सियार दोनों ठगे रह गए।
तभी आकाशवाणी हुई, “तुमने प्राणियों को उपदेश तो दिए, लेकिन उनमें सच्ची संवेदना नहीं, केवल स्वार्थ छिपा था। इसलिए तुम्हें इस निकृष्ट योनि से शीघ्र मुक्ति नहीं मिलेगी।”
दूसरों के कष्ट पर सच्चे मन से दुख प्रकट करना चाहिए। केवल दिखावे की संवेदना अंततः गिद्ध और सियार जैसी गति ही देती है।
