■ सूर्यकांत उपाध्याय

कई महीनों की कोशिशों के बाद आखिरकार शारदा अपने पति आदित्य को मथुरा-वृन्दावन ले जाने के लिए तैयार कर पाई थी। आदित्य को ऑफिस से मुश्किल से छुट्टी मिली थी। छुट्टी मिलने के बाद भी वह यात्रा से एक दिन पहले रात दो बजे तक लैपटॉप पर काम करता रहा। सुबह जल्दी उठकर भी वह ईमेल भेजने में लगा था।
शारदा तैयार होकर अपनी छोटी बेटी स्नेहा को भी तैयार कर चुकी थी। उसने नाराज़ होकर कहा, “आप अभी तक काम में लगे हैं। स्टेशन कब पहुंचेंगे? ट्रेन छूट जाएगी।”
आदित्य ने घड़ी देखी और बोला, “अरे, अभी बहुत समय है। नई दिल्ली स्टेशन आधे घंटे में पहुंच जाएंगे।”
लेकिन जल्दबाज़ी और ट्रैफिक के कारण वे स्टेशन देर से पहुंचे और ट्रेन छूट गई। यह देखकर शारदा का गुस्सा फूट पड़ा।
“क्या फायदा ऐसी छुट्टी का? ऑफिस का काम छोड़ते ही नहीं। मुझे घर छोड़ दो और खुद ऑफिस चले जाओ,” उसने तमतमाते हुए कहा।
आदित्य ने शांत स्वर में कहा, “गुस्सा मत करो। अच्छे काम के रास्ते में परेशानियां आती रहती हैं। बस से चलते हैं।”
तीनों बस अड्डे पहुंचे और मथुरा जाने वाली एक पुरानी रोडवेज बस में बैठ गए। बस की हालत बेहद खराब थी और उसकी धीमी रफ्तार देखकर सब परेशान हो रहे थे। तभी रास्ते में बस एक ढाबे पर रुकी।
वहां एक छोटी बच्ची पसीने से लथपथ लस्सी बेच रही थी। आदित्य ने उससे तीन गिलास लस्सी ली। बच्ची खुद लस्सी पीने से डर रही थी, क्योंकि ढाबे का मालिक उसे मारता था। जब आदित्य ने उसके छोटे भाई के बारे में जाना, जो पेड़ के नीचे बैठा था, तो उसका दिल पसीज गया।
कुछ देर बाद ढाबे का मालिक आया और बच्ची को डांटने लगा। उसने बताया कि बच्चा भी पहले काम करता था, लेकिन मार खाने के कारण अब अपाहिज होकर भीख मांगता है। यह सुनकर आदित्य का खून खौल उठा। उसने तुरंत पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने बच्चों से मजदूरी कराने के आरोप में ढाबे के मालिक को गिरफ्तार कर लिया।
बच्ची रोते हुए बोली, “साहब, अब हमारी रोजी-रोटी छिन गई। हम भूखे मर जाएंगे।”
आदित्य उन दोनों बच्चों को अपने साथ मथुरा ले गया और एक अनाथ आश्रम में उनका दाखिला करवा दिया, जहां उनके रहने, खाने और पढ़ाई की व्यवस्था हो गई।
जब वे आश्रम से बाहर निकले तो शारदा बोली, “अब तो मंदिर भी बंद हो गए। दर्शन भी नहीं हो पाए।”
आदित्य मुस्कराकर बोला, “तुम समझी नहीं। ठाकुर जी ने हमें अपने दर्शन से पहले उनकी सेवा का अवसर दिया था। शायद इसी पुण्य काम के लिए हमारी ट्रेन छूट गई थी।”
शारदा की आंखें नम हो गईं। उसने श्रद्धा से कहा, “सच है, ठाकुर जी किस रूप में सेवा का अवसर दें, यह कोई नहीं जान सकता।”
