■ सूर्यकांत उपाध्याय

भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों की कठोर तपस्या के बाद देवी सावित्री प्रकट हुईं और वरदान दिया कि उन्हें एक तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी। देवी की कृपा से जन्म लेने के कारण कन्या का नाम सावित्री रखा गया।
युवावस्था में पहुँचने पर सावित्री के लिए योग्य वर नहीं मिल रहा था। तब राजा ने उन्हें स्वयं वर चुनने की अनुमति दी। वन भ्रमण के दौरान सावित्री ने साल्व देश के राजकुमार सत्यवान को पति रूप में चुना। ऋषि नारद ने राजा अश्वपति को बताया कि सत्यवान गुणवान तो हैं, पर अल्पायु हैं और एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु हो जाएगी। यह सुनकर राजा चिंतित हो उठे, किंतु सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रहीं। अंततः उनका विवाह सत्यवान से हो गया।
विवाह के बाद सावित्री अपने सास-ससुर की सेवा में लग गईं। जब सत्यवान की मृत्यु का समय निकट आया, तब उन्होंने तीन दिन का कठोर व्रत रखा। नियत दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल गए और सावित्री भी साथ गईं। अचानक सत्यवान के सिर में तीव्र पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में अचेत हो गए। तभी यमराज उनके प्राण हरकर ले जाने लगे।
सावित्री भी यमराज के पीछे चल पड़ीं। उनकी पतिव्रता निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने तीन वरदान दिए, सास-ससुर की दृष्टि लौटाना, खोया हुआ राज्य वापस दिलाना और सौ पुत्रों का आशीर्वाद।
तब सावित्री ने विनम्रता से कहा कि पति के बिना पुत्र कैसे संभव हैं। उनकी बुद्धिमत्ता और अटूट निष्ठा से प्रसन्न होकर यमराज ने सत्यवान को पुनर्जीवन दे दिया।
इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रत बल से पति के प्राण वापस प्राप्त किए।
