■ सूर्यकांत उपाध्याय

बुद्ध के पास मौलुंकपुत्त नाम का एक दार्शनिक आया। उसने पूछा, ‘क्या ईश्वर है?’
बुद्ध ने कहा, ‘क्या तुम सचमुच जानना चाहते हो या यह केवल बौद्धिक जिज्ञासा है?’
मौलुंकपुत्त ने उत्तर दिया कि वह सत्य को जानने के लिए दूर-दूर से यात्रा करके आया है। तब बुद्ध ने कहा, ‘यदि सच में जानना चाहते हो, तो कुछ दांव पर लगाने की तैयारी भी होनी चाहिए।’
मौलुंकपुत्त ने कहा, ‘मैं सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हूँ।’
बुद्ध बोले, ‘तो दो वर्ष तक मेरे पास मौन रहो। न कोई प्रश्न, न कोई चर्चा। दो वर्ष बाद मैं स्वयं तुम्हें पूछने का अवसर दूंगा।’
यह सुनकर मौलुंकपुत्त असमंजस में पड़ गया। उसे लगा कि प्राण देना आसान हो सकता है, लेकिन दो वर्ष तक मौन रहना अत्यंत कठिन है। फिर भी उसने चुनौती स्वीकार कर ली।
उसी समय पास बैठा एक भिक्षु हंस पड़ा। उसने कहा, ‘मैं भी इसी प्रश्न के साथ आया था। मुझे भी दो वर्ष मौन रहने को कहा गया था। जब दो वर्ष पूरे हुए, तब पूछने के लिए कुछ बचा ही नहीं। यदि पूछना है तो अभी पूछ लो।’
बुद्ध मुस्कराए और बोले, ‘मैं अपने वचन पर कायम रहूंगा। यदि तब भी प्रश्न रहेगा, तो उत्तर दूंगा।’
मौलुंकपुत्त दो वर्ष तक बुद्ध के पास मौन साधना में बैठा रहा। धीरे-धीरे उसके विचार शांत होने लगे। मन स्थिर हुआ, ध्यान गहरा हुआ और भीतर एक नई अनुभूति का जन्म हुआ।
दो वर्ष पूरे होने पर बुद्ध ने उसे बुलाया और कहा, ‘अब पूछो।’
मौलुंकपुत्त हंस पड़ा। उसने कहा, ‘अब कोई प्रश्न नहीं बचा। मौन में ही उत्तर मिल गया।’
ज्ञानियों का कहना है कि परम सत्य शब्दों और तर्कों से नहीं मिलता। प्रश्नों के पीछे भागने से उत्तर नहीं मिलता; उत्तर तो तब प्रकट होता है जब मन शांत होकर शून्य में उतरता है। उसी मौन में परमात्मा का अनुभव होता है। तब व्यक्ति यह नहीं पूछता कि परमात्मा कहाँ है, बल्कि उसे हर दिशा में उसी का अस्तित्व दिखाई देने लगता है।
