- सूर्यकांत उपाध्याय

एक संन्यासी बरसाना में रहता था। वह हर रोज सुबह उठकर यमुना में स्नान करके राधा रानी के दर्शन करने जाया करता था। यह उसके दिनचर्या का नियम था। जब तक वह राधा रानी के दर्शन नहीं कर लेता था, तब तक जल भी ग्रहण नहीं करता था।
दर्शन करते-करते उसकी उम्र लगभग अस्सी वर्ष हो गई थी। एक सुबह वह रोज की तरह उठकर यमुना में स्नान करके राधा रानी के दर्शन के लिए निकल पड़ा। मंदिर के पट खुले और वह राधा रानी के दर्शन करने लगा।
दर्शन के दौरान उसके मन में विचार आया – “मुझे राधा रानी के दर्शन करते-करते अब अस्सी वर्ष हो गए, पर मैंने आज तक राधा रानी को कोई वस्त्र चढ़ाया नहीं। लोग राधा रानी के लिए नारियल लाते हैं, कोई चुनरी लाता है, कोई चूड़ी लाता है, कोई बिंदी लाता है, कोई साड़ी लाता है, कोई लहंगा-चुनरी लाता है। पर मैंने आज तक कुछ भी नहीं चढ़ाया।”
उसने सोचा, “जब सभी राधा रानी के लिए कुछ न कुछ लाते हैं, तो मैं भी कुछ लेकर आऊंगा। पर क्या लाऊँ जिससे राधा रानी खुश हों?”
यह सोचकर वह अपनी कुटिया लौट आया। सारी रात बस यही सोचता रहा। सुबह उठकर स्नान किया और अपनी कुटिया में ही राधा रानी के दर्शन-पूजन किए। दर्शन के बाद वह बाजार गया और सबसे सुंदर लहंगा-चुनरी का कपड़ा खरीद लाया। अपनी कुटिया में आकर उसने अपने हाथों से लहंगा-चुनरी सिलकर उस पर गोटे लगाए।
जब उसने लहंगा-चुनरी पूरी तरह तैयार कर लिया तो मन में प्रसन्नता हुई और सोचा, “यह लहंगा-चुनरी राधा रानी को पहनाऊँगा तो वे बहुत सुंदर दिखेंगी।”
यह सोचकर वह लहंगा-चुनरी लेकर राधा रानी के मंदिर को गया। मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए वह अपने मन में बार-बार सोच रहा था, “आज मेरे हाथों से बनी यह पोशाक राधा रानी को पहनाऊँगा, तो मेरी लाडली खूब सुंदर दिखेंगी।”
इतने में बरसाना की एक लड़की, लाली, आई और बाबाजी से बोली, “बाबा, आप आज बहुत खुश लगते हैं, क्या बात है? बताइए।”
बाबा ने कहा, “लाली, आज मैं बहुत खुश हूँ। मैंने अपने हाथों से राधा रानी के लिए लहंगा-चुनरी बनाया है। यह राधा रानी को पहनाऊँगा और वे बहुत सुंदर दिखेंगी।”
लाली ने कहा, “बाबा, मुझे भी दिखाइए कि आपने लहंगा-चुनरी कैसी बनाई है।”
लहंगा-चुनरी देखकर वह बोली, “अरे बाबा, राधा रानी के पास तो बहुत सारी पोशाकें हैं। यह मुझे दे दीजिए।”
बाबा ने कहा, “बेटी, मैं तुम्हें दूसरी कोई चीज़ खरीदकर दे दूँगा। यह मैंने राधा रानी के लिए बनाकर लाया है; यह नहीं दे सकता।”
पर छोटी बालिका ने बाबा का दुपट्टा पकड़ लिया और बार-बार कहा, “बाबा, यह मुझे दे दीजिए।”
बाबा ने जिद की कि “नहीं, मैं यह नहीं दे सकता।”
फिर भी वह बच्ची इतनी चंचल थी कि उसने बाबा के हाथ से लहंगा-चुनरी छीनकर भाग गई।बाबा बहुत दुखी हो गए।
उन्होंने सोचा, “मैंने आज तक राधा रानी को कुछ नहीं चढ़ाया, और जब लेकर आया तो लाली ले भाग गई। मेरा जीवन बर्बाद हो गया; अब क्या करूँ?”
यह सोचकर बाबा वहीँ सीढ़ियों पर बैठकर रोने लगे।कुछ अन्य संन्यासी वहाँ आए और बोले, “बाबा, क्या बात है? आप क्यों रो रहे हैं?” बाबा ने उन्हें पूरा प्रसंग बताया।
संन्यासियों ने समझाया, “दुख मत करो। कल फिर एक और लहंगा-चुनरी बना कर राधा रानी को पहनाकर देना। चलो, अब राधा रानी के दर्शन कर लेते हैं।”
उनकी बातें सुनकर बाबा का रोना बंद तो हो गया पर मन अभी भी व्यथित था, क्योंकि उनकी कामना पूरी नहीं हुई थी।
वे अनमने मन से दर्शन करने मंदिर जा रहे थे और मन में सोच रहे थे, “शायद किशोरी की इच्छा नहीं थी; शायद राधा रानी मेरी बनाई पोशाक पहनना ही नहीं चाहतीं।”
यह सोचकर वे बड़े दुःखी थे।मंदिर आकर वे राधा रानी के पट खुलने का इंतजार करने लगे। कुछ ही देर बाद पट खुला और संन्यासी बोले, “बाबा, देखिए, आज राधा रानी बहुत सुंदर लग रही हैं।”
यह सुनकर जैसे ही बाबा ने सिर उठाकर देखा, तो वह लहंगा-चुनरी जो उन्होंने अपने हाथों से बनाई थी, वही राधा रानी ने पहना हुआ था।
बाबा अत्यंत खुश हुए और राधा रानी से बोले, “हे राधा रानी, आपको इतना सब्र कैसे नहीं रहा कि आपने मेरे हाथों की बनी पोशाक मंदिर की सीढ़ियों से ही लेकर भाग गईं? ऐसा क्यों?”
सर्वेश्वरी श्री राधा रानी ने उत्तर दिया, “बाबा, आपके भाव को देखकर मैं स्वयं नहीं रोक पाई। यह केवल पोशाक नहीं है, इसमें आपका प्रेम भरा है। इसलिए मैंने स्वयं आकर वह लहंगा-चुनरी आपसे छीन लिया था।”
यह सुनकर बाबा भाव-विभोर हो गए और उसी समय उन्होंने किशोरी (लाली) का धन्यवाद किया।
