- सूर्यकांत उपाध्याय

मोहन बेटा! मैं तुम्हारे काका के घर जा रहा हूँ…
‘क्यों पिताजी? और आप आजकल काका के घर बहुत जाने लगे हैं।’
‘तुम्हारा मन मान रहा हो तो जाने दो बेटा।’
‘ठीक है पिताजी, ये कुछ पैसे रख लीजिए, काम आएंगे।’
यह सुनकर पिताजी की आँखें भर आईं। उन्हें लगा जैसे वर्षों पहले बेटे को दिए गए संस्कार आज लौटकर उनके सामने खड़े हैं।
मोहन बचपन में स्कूल जाता था तो जेब खर्च मांगने में संकोच करता था, क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसके पिताजी मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पालन-पोषण करते थे। फिर भी माँ उसकी जेब में कुछ सिक्के रख देती थीं, जबकि वह बार-बार मना करता था।
समय बीता, मोहन बड़ा हो गया। उसकी पत्नी का स्वभाव ससुर के प्रति विशेष अच्छा नहीं था। वह उनकी आदतों और समझाइशों पर नाराज़ हो जाती। बच्चों का भी दादा जी के कमरे में आना-जाना कम था। मोहन स्वयं काम में इतना व्यस्त रहता कि पिता से खुलकर बात नहीं कर पाता।
एक दिन उसे जिज्ञासा हुई कि पिताजी आखिर रोज काका के घर क्यों जाते हैं। उसने चुपचाप उनका पीछा किया। यह देखकर वह हैरान रह गया कि पिताजी काका के घर जाते ही नहीं थे। वे स्टेशन के पास एक पेड़ के नीचे घंटों अकेले बैठे रहते और शाम को घर लौट आते।
वहीं खड़े एक बुजुर्ग ने कहा, ‘बेटा, ऐसे बहुत से वृद्ध यहाँ मिल जाएंगे। जब घर में उन्हें प्यार और अपनापन नहीं मिलता, तो वे समय काटने के लिए घर से बाहर भटकते रहते हैं।’
फिर उन्होंने कहा, ‘बुढ़ापे में इंसान का मन बच्चे जैसा हो जाता है। उस समय उसे सबसे अधिक प्रेम, सम्मान और साथ की आवश्यकता होती है।’
यह सुनकर मोहन का हृदय द्रवित हो गया। घर लौटकर उसने किसी से कुछ नहीं कहा। अगले कुछ दिनों तक उसने पत्नी और बच्चों से बात करना लगभग बंद कर दिया। जब सभी परेशान हो गए और कारण पूछा, तब उसने समझाया, ‘मैंने कुछ दिन बात नहीं की तो तुम सब बेचैन हो गए। सोचो, पिताजी कितने समय से यह पीड़ा सह रहे होंगे।’
उस दिन के बाद परिवार का व्यवहार बदल गया। बच्चे दादा जी के पास बैठने लगे, उनसे कहानियाँ सुनने लगे। बहू भी उनका आदर करने लगी। घर में फिर से हँसी और अपनापन लौट आया।
कुछ दिनों बाद मोहन ने मुस्कराकर पूछा, ‘पिताजी, आजकल काका के घर नहीं जाते?’
पिताजी ने स्नेहभरी मुस्कान के साथ उत्तर दिया, ‘नहीं बेटा, अब तो अपना घर ही स्वर्ग लगता है।’
