◾सूर्यकांत उपाध्याय

काशी की पवित्र गलियों में स्थित एक प्राचीन राम-जानकी मंदिर की सेवा वृद्ध पंडित रामनारायण मिश्र वर्षों से निष्ठापूर्वक कर रहे थे। प्रभु भक्ति ही उनका जीवन थी। उनकी छोटी-सी गृहस्थी में पत्नी और विवाह योग्य पुत्री कमला थी। सीमित आय और आर्थिक तंगी के कारण बेटी के विवाह की चिंता उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रही थी। अनेक प्रयासों के बाद भी दहेज और खर्चों के कारण कोई रिश्ता तय नहीं हो पा रहा था।
एक दिन दोपहर के समय मंदिर में सन्नाटा था। पंडित जी प्रभु के सामने बैठकर अपनी व्यथा सुना रहे थे। आँखों से आँसू बह रहे थे और मन पूरी तरह निराश था। तभी मंदिर में एक तेजस्वी वृद्ध दंपत्ति आए। वृद्ध ने अपना परिचय विशम्भर नाथ के रूप में दिया और बताया कि वे गुजरात से आए हैं। उन्होंने कहा कि वे निःसंतान हैं और उनकी इच्छा किसी निर्धन कन्या का कन्यादान करने की है।
पंडित जी ने अपनी बेटी की स्थिति बताई। यह सुनकर दंपत्ति ने तत्काल सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने एक योग्य युवक के परिवार का पता दिया और कहा कि विवाह की व्यवस्था की चिंता वे स्वयं करेंगे। पंडित जी को लगा मानो प्रभु ने उनकी पुकार सुन ली हो।
जब वे बताए गए परिवार से मिले तो आश्चर्यजनक रूप से रिश्ता तुरंत तय हो गया। इसके बाद विवाह की तैयारियाँ शुरू हुईं। जब भी किसी वस्तु, धन या व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती, पंडित जी विशम्भर नाथ को फोन करते और थोड़ी ही देर में सब कुछ उपलब्ध हो जाता। विवाह की सारी जिम्मेदारी मानो किसी अदृश्य शक्ति ने संभाल ली थी।
समय आने पर कमला का विवाह पूरे सम्मान और आनंद के साथ संपन्न हो गया। बेटी की विदाई के बाद पंडित जी उस दंपत्ति का धन्यवाद करने के लिए उनसे संपर्क करना चाहते थे, लेकिन उनका फोन लगातार बंद मिला। उन्होंने अपने समधी से भी पूछताछ की, परंतु वे ऐसे किसी व्यक्ति को जानते ही नहीं थे।
यह सुनते ही पंडित जी स्तब्ध रह गए। उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उन्हें अनुभव हुआ कि संकट की घड़ी में सहायता करने वाले कोई सामान्य मनुष्य नहीं थे, बल्कि स्वयं प्रभु श्रीराम और माता जानकी ही थे, जिन्होंने भक्त की पुकार सुनकर मानव रूप में उसकी सहायता की।
उस दिन पंडित जी का विश्वास और दृढ़ हो गया कि सच्ची श्रद्धा, निष्काम भक्ति और अटूट विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाते। प्रभु अपने भक्त का साथ अवश्य निभाते हैं।
