▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक छोटे से कस्बे में एक गरीब वृद्ध महिला रहती थी। उसकी आँखों की रोशनी बहुत कम थी और वह भिक्षा माँगकर अपना जीवन यापन करती थी। एक दिन उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। तेज़ बुखार और कमजोरी के कारण वह चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गई।
उसी समय एक दयालु व्यक्ति ने उसकी हालत देखकर उसे 500 रुपए का नोट दिया और कहा, ‘माई, इससे दवा खरीद लेना। भगवान तुम्हें जल्द स्वस्थ करे।’
वृद्धा ने उसे आशीर्वाद दिया और घर की ओर चल पड़ी। रास्ते में दो युवक शराब के नशे में बैठे थे। उनकी नज़र वृद्धा के भिक्षापात्र में रखे 500 रुपए के नोट पर पड़ी। शरारतवश एक युवक ने चुपके से वह नोट निकालकर अपनी जेब में रख लिया।
वृद्धा को कुछ आभास तो हुआ, लेकिन वह असहाय थी। बिना कुछ कहे वह घर लौट गई। दवा न मिलने के कारण उसकी तबीयत रातभर बिगड़ती रही।
अगली सुबह जब युवकों का नशा उतरा, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तय किया कि शाम को वृद्धा को पैसे वापस कर देंगे। लेकिन वह उस स्थान पर नहीं आई। चिंतित होकर वे उसका घर ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँचे।
घर के बाहर उदासी का माहौल था। पूछने पर पता चला कि रात में दवा न मिलने के कारण वृद्धा का निधन हो गया।
यह सुनकर दोनों युवक स्तब्ध रह गए। उन्हें समझ में आ गया कि उनकी एक छोटी-सी शरारत किसी की जान की वजह बन गई। अपराधबोध से उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने संकल्प लिया कि वे कभी शराब नहीं पिएँगे और न ही ऐसा कोई काम करेंगे, जिससे किसी को कष्ट पहुँचे।
समय के साथ दोनों का जीवन बदल गया। वे जरूरतमंद लोगों की सहायता करने लगे और अपनी गलती को जीवन भर याद रखते हुए समाजसेवा में जुट गए।
• सीख : किसी भी कार्य को करने से पहले उसके परिणामों के बारे में अवश्य सोचें। हमारी छोटी-सी लापरवाही या शरारत भी किसी के जीवन पर गहरा प्रभाव डाल सकती है।
