▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

संत मलूकदास जी का हृदय सदैव प्रभु-भक्ति में डूबा रहता था। एक बार उनके मन में भगवान नीलमाधव (जगन्नाथ जी) के दर्शन हेतु पुरी जाने की तीव्र इच्छा जागी। उस समय यातायात के साधन नहीं थे, इसलिए वे लाठी के सहारे ‘जय जगन्नाथ’ का जप करते हुए पैदल ही यात्रा पर निकल पड़े।
कई दिनों तक लगातार चलने से उनका शरीर अत्यंत थक गया। पैरों में छाले पड़ गए और भूख-प्यास से वे निढाल हो गए। अंततः एक घने वृक्ष की छाया में बैठकर उन्होंने विचार किया कि जब प्रभु सर्वव्यापी हैं, तो उनके पास जाने की आवश्यकता ही क्या है। यदि उनकी भक्ति सच्ची है, तो भगवान स्वयं उनकी सुध लेंगे।
इसी भाव से उन्होंने प्रतिज्ञा की, ‘हे प्रभु! अब मैं यहां से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाऊंगा। यदि आप मुझसे प्रेम करते हैं, तो स्वयं आकर दर्शन दीजिए और मेरी भूख शांत कीजिए। मैं किसी से कुछ नहीं मांगूंगा।’
वे ध्यान में लीन हो गए। दिन बीता, रात हुई और चारों ओर सन्नाटा छा गया। तभी आधी रात को वहां दिव्य प्रकाश फैला। मलूकदास जी ने आंखें खोलीं तो देखा कि एक सांवला, सुंदर बालक स्वर्ण थाल में भात, दाल और प्रसाद लेकर खड़ा है। बालक ने कहा, ‘बाबा, जगन्नाथ जी ने आपके लिए यह महाप्रसाद भेजा है।’
भोजन के बाद बालक चला गया। अगले दिन पुरी मंदिर में हड़कंप मच गया, क्योंकि भगवान के भोग का स्वर्ण थाल गायब था। तभी मुख्य पुजारी को दिव्य संकेत मिला कि स्वयं भगवान अपने भक्त मलूकदास को भोजन कराने गए थे।
राजा, पुजारी और सैनिक उस स्थान पर पहुंचे। वहां संत मलूकदास ध्यानमग्न बैठे थे और उनके पास वही स्वर्ण थाल रखा था। तब सबको ज्ञात हुआ कि रात में आया बालक कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि स्वयं भगवान जगन्नाथ थे।
यह कथा बताती है कि जब भक्त पूर्ण शरणागति और निष्कपट भक्ति के भाव में डूब जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी सहायता के लिए आते हैं। संत मलूकदास ने इसी सत्य को अपने प्रसिद्ध दोहे में व्यक्त किया है-
‘अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम॥’
