▪️सूर्यकांत उपाध्याय

जगन्नाथ धाम के रत्न भंडार से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा सामाजिक समरसता, भक्ति और देवी लक्ष्मी की महिमा का संदेश देती है। मान्यता है कि देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु से इच्छा व्यक्त की थी कि वे पृथ्वी पर निवास करें और स्वयं उनके लिए भोजन बनाकर भोग लगाएं। कालांतर में पुरी का श्रीमंदिर इसी दिव्य लीला का केंद्र बना, जहां लक्ष्मी को मंदिर की स्वामिनी माना जाता है और रत्न भंडार उनके वैभव का प्रतीक है।
कथा के अनुसार, पुरी में श्रिया नाम की एक निर्धन महिला रहती थी। वह निम्न जाति की मानी जाती थी, लेकिन देवी लक्ष्मी की अनन्य भक्त थी। उसकी इच्छा अष्टलक्ष्मी व्रत करने की थी, पर किसी ने उसे व्रत-विधि नहीं बताई। उपेक्षा और तिरस्कार के बीच भटकते-भटकते वह एक दिन घायल होकर गिर पड़ी। अपने भक्त के दुःख से भगवान जगन्नाथ इतने व्यथित हुए कि उनकी प्रतिमा से भी रक्त प्रवाहित होने लगा। इसे देखकर राजा और पुजारी चिंतित हो उठे।
भगवान के आदेश पर नारद मुनि संत के वेश में श्रिया के पास पहुंचे और उसे बताया कि सच्ची भक्ति ही सबसे बड़ा व्रत है। उन्होंने श्रिया को घर की स्वच्छता, सदाचार और श्रद्धा के साथ खीर का भोग लगाने का मार्ग बताया। श्रिया ने वैसा ही किया। उसी शाम घूंघट ओढ़े एक महिला उसके घर आई, प्रसाद ग्रहण किया और जाते समय एक पोटली दे गई। उसमें रत्न, हीरे और स्वर्णाभूषण थे। श्रिया समझ गई कि स्वयं देवी लक्ष्मी उस पर प्रसन्न हुई हैं।
जब देवी लक्ष्मी श्रीमंदिर लौटीं तो बलभद्र ने यह कहकर आपत्ति जताई कि उन्होंने निम्न जाति की महिला के घर भोजन किया है। क्रोधित होकर लक्ष्मी ने मंदिर छोड़ दिया और श्राप दिया कि जब तक दोनों भाई किसी निम्न समझे जाने वाले व्यक्ति के हाथ का भोजन स्वीकार नहीं करेंगे, उन्हें अन्न नहीं मिलेगा।
लक्ष्मी के जाते ही श्रीमंदिर का वैभव समाप्त होने लगा। रत्न भंडार खाली हो गया, अन्न नष्ट होने लगा और मंदिर की व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई। जगन्नाथ और बलभद्र वर्षों तक भोजन के लिए भटकते रहे। अंततः उन्हें ज्ञात हुआ कि जिस गृहस्वामिनी के यहां भोजन मिला, वह स्वयं लक्ष्मी थीं। दोनों ने उनसे क्षमा मांगी और सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस ले आए।
लक्ष्मी के लौटते ही मंदिर का वैभव पुनः स्थापित हो गया और रत्न भंडार फिर से भर गया। यह कथा बताती है कि भगवान की दृष्टि में सभी समान हैं और सच्ची भक्ति जाति या सामाजिक भेदभाव से कहीं ऊपर है।
