▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

बरसाना में एक बार श्री लाड़ली सरकार जू अपनी सखियों के साथ एक कुंज में विराजमान थीं।
चारों ओर पुष्पों की सुगंध बिखरी हुई थी, मंद-मंद पवन बह रही थी और सखियाँ मधुर स्वर में ‘राधे-राधे’ का कीर्तन कर रही थीं।
उधर, नंदलाल श्रीकृष्ण जी को जब ज्ञात हुआ कि आज श्रीजी अत्यंत प्रसन्न हैं, तो उन्होंने सोचा-
‘आज कुछ नई लीला करनी चाहिए।’
श्यामसुंदर ने एक माली का वेश धारण किया। सिर पर पगड़ी, हाथ में फूलों की टोकरी और चेहरे पर मंद मुस्कान लिए वे बरसाना पहुँच गए।
उन्होंने श्री लाड़ली जू के समक्ष जाकर कहा-
‘श्रीमती जी! आपके लिए वृंदावन से सबसे सुंदर फूल लाया हूँ।’
सखियाँ तुरंत समझ गईं कि यह कोई साधारण माली नहीं है, किंतु लीला का आनंद लेने के लिए सभी मौन रहीं।
श्रीजी ने मुस्कुराकर पूछा-
‘अच्छा माली जी, इन फूलों के बदले क्या मूल्य लोगे?’
कान्हा बोले-
‘बस एक मुस्कान।’
यह सुनकर सखियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। श्री लाड़ली जू ने लज्जावश अपना मुख झुका लिया।
तभी एक सखी बोली-
‘अरे! ये कोई माली नहीं हैं, ये तो हमारे श्यामसुंदर हैं!’
श्रीकृष्ण जी हँस पड़े और बोले-
‘राधे! पूरे ब्रज में सबसे सुंदर पुष्प तो आपका प्रेम है। मैं तो उसी प्रेम का भिखारी बनकर बार-बार आता हूँ।’
यह सुनते ही श्री लाड़ली जू की आँखें प्रेमाश्रुओं से भर गईं। कुंज में ‘राधे-श्याम’ के जयघोष गूँज उठे।
तभी से भक्त कहते हैं-
‘भगवान श्रीकृष्ण को वैभव नहीं, केवल श्रीराधा जैसा निष्कलंक प्रेम प्रिय है।’
