▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माँ पार्वती विराजमान थे। शिव जी ध्यानमग्न थे। तभी पार्वती जी ने देखा कि वे मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं।
पार्वती जी के मन में जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि आज महादेव ध्यान मुद्रा में भी क्यों मुस्कुरा रहे हैं।
उन्होंने भोलेनाथ की समाधि समाप्त होने पर उनसे पूछा,
स्वामी, मैंने आपको पहली बार समाधि में मुस्कुराते हुए देखा है, इसका क्या कारण है?
शिव जी ने उन्हें बताया कि वे अपने एक भक्त और उसकी पत्नी की बातें सुनकर मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने पूरी बात बताते हुए कहा कि मृत्युलोक में उनका एक अनन्य भक्त है, जो एक ब्राह्मण है और उनके ही एक मंदिर में पुजारी के रूप में सेवा करता है। वह दिन-रात उनकी आराधना में लीन रहता है।
वह उसी मंदिर के पीछे एक छोटी सी कुटिया में अपनी पत्नी के साथ रहता है। उसकी पत्नी चाहती है कि उनके पास अपना घर और धन-संपत्ति हो, जिससे वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके, परंतु पुजारी केवल मंदिर के चढ़ावे पर निर्भर है।
मंदिर में आने वाले दान-दक्षिणा से ही बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चलता है, ऐसे में घर और अन्य सुविधाएँ कहाँ से आ सकती हैं। फिर भी वह दिन-रात भगवान शिव से अपनी पत्नी की इच्छा पूर्ण करने की प्रार्थना करता रहता है। आज उसकी पत्नी ने उससे ऐसी बात कही, जिसे सुनकर शिव जी मुस्कुराए बिना नहीं रह सके।
पार्वती जी ने पूछा, ऐसा क्या कहा उसकी पत्नी ने, जो आपका ध्यान भी भंग हो गया?
शिव जी ने बताया कि उसकी पत्नी ने ताना मारते हुए कहा, जिन भोले शंकर की तुम दिन-रात सेवा करते हो और जिनसे मेरे लिए घर माँगते हो, उनके पास तो खुद का घर नहीं है, वे तो स्वयं कैलाश पर्वत पर रहते हैं, वे तुम्हें घर कहाँ से देंगे।
बस यही बात सुनकर मैं मुस्कुरा रहा था।
यह सुनकर पार्वती जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा, स्वामी, यह सुनकर तो मुझे बहुत बुरा लगा, वह आपकी निंदा कर रही है और आप मुस्कुरा रहे हैं।
आप उसे एक घर और सुख-सुविधाएँ दे दीजिए, जिससे वह आपकी निंदा न करे।
इस पर शिव जी ने कहा, पार्वती, यह मेरे वश में नहीं है। ये सभी प्राणी मृत्युलोक में अपने पिछले जन्म और इस जन्म के कर्मों का फल भोग रहे हैं। जैसे ही उनके कर्मों का फल पूर्ण होता है, वे मुक्ति प्राप्त करते हैं। इसी कारण इसे मृत्युलोक कहा गया है। मनुष्य बार-बार जन्म लेकर अपने कर्मों का हिसाब चुकाता है।
यह कर्मभूमि है, यहाँ बिना कर्म के कोई गति नहीं।
आगे शिव जी ने कहा कि यह ब्राह्मण पिछले जन्म में एक साहूकार था, जो लोगों की जमीन, जेवर और पशु आदि गिरवी रखकर उन्हें धन देता था और बाद में उनकी संपत्ति हड़प लेता था। उस धन का उपयोग उसकी पत्नी भी करती थी। इसी कारण इस जन्म में उसे घर का सुख प्राप्त नहीं हो पा रहा है, और उसकी पत्नी भी उसी कर्मफल को भोग रही है।
वह इस जन्म में मेरी सेवा कर रहा है, जिससे उसके पूर्व कर्मों के फल में जो कष्ट मिलने थे, वे भक्ति के कारण कुछ हद तक कम हो गए हैं। उसका जीवन अपेक्षाकृत शांति से बीत रहा है, परंतु जब तक कर्मों का हिसाब पूरा नहीं होता, तब तक उसे घर और अन्य सुविधाएँ नहीं मिल सकतीं।
यही विधि का विधान है।
पार्वती जी ने कहा, यह तो ठीक है, पर उसकी पत्नी जो आपकी निंदा कर रही है, उसका क्या?
तब शिव जी ने कहा, जैसे-जैसे कलियुग आगे बढ़ेगा, मनुष्य भगवान की भक्ति करने के स्थान पर उनकी निंदा करने लगेंगे। यह सृष्टि के आरंभ में ही निर्धारित है।
जो व्यक्ति इस कठिन समय में मेरी सेवा करता रहेगा, उसे इस मृत्युलोक से मुक्ति अवश्य प्राप्त होगी।
