▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

स्वर्गलोक की प्रसिद्ध अप्सराओं में मेनका, रंभा, उर्वशी, तिलोत्तमा और घृताची का विशेष स्थान माना गया है। इनमें घृताची अपनी अनुपम सुंदरता, मधुर नृत्य, संगीत-कला और विनम्र स्वभाव के लिए विख्यात थी। पुराणों तथा महाभारत के अनेक प्रसंगों में उसका उल्लेख मिलता है। इंद्रसभा में जब वह वीणा और नृत्य से देवताओं का मनोरंजन करती, तब संपूर्ण सभा उसके दिव्य सौंदर्य और कला से अभिभूत हो उठती थी।
देवराज इंद्र को जब भी यह आशंका होती कि किसी महर्षि की कठोर तपस्या से उनका इंद्रासन संकट में पड़ सकता है, तब वे कभी मेनका, कभी रंभा और कभी घृताची जैसी अप्सराओं को पृथ्वी पर भेजते थे। यह उनका व्यक्तिगत निर्णय नहीं, देवव्यवस्था का एक अंग माना जाता था। स्वयं अप्सराएँ भी अनेक बार इस दायित्व को निभाते समय धर्मसंकट में पड़ जाती थीं।
एक बार एक महातपस्वी ऋषि घोर तप में लीन थे। उनके तपोबल से तीनों लोक आलोकित होने लगे। देवताओं ने आशंका व्यक्त की कि यदि उनका तप पूर्ण हो गया तो वे असाधारण वरदान प्राप्त कर सकते हैं। तब इंद्र ने घृताची को पृथ्वी पर जाने का आदेश दिया।
घृताची वन में पहुँची। मंद समीर बह रही थी, सरोवर के तट पर कमल खिले थे और पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पावन बना रहा था। उसने वीणा के मधुर स्वर छेड़े। संगीत और उसके दिव्य रूप के प्रभाव से ऋषि का ध्यान भंग हो गया और उनकी दीर्घकालीन तपस्या खंडित हो गई।
ऋषि अत्यंत क्रोधित हुए और घृताची को श्राप देने के लिए उद्यत हुए। तब उसने विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा, ‘हे मुनिवर! मैं अपने स्वार्थ से नहीं आई हूँ। मैं तो केवल देवराज इंद्र की आज्ञा का पालन कर रही थी। यदि अपराध हुआ है तो मुझे क्षमा करें।’
ऋषि का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने अनुभव किया कि वास्तविक कारण घृताची नहीं, दैवीय व्यवस्था थी। उन्होंने उसे श्राप देने के स्थान पर आशीर्वाद दिया कि उसका नाम युगों तक दिव्य अप्सराओं में आदर के साथ लिया जाएगा।
महाभारत और पुराणों में घृताची का संबंध अनेक ऋषियों और राजवंशों की कथाओं से भी मिलता है। उसके माध्यम से कई तेजस्वी संतानों और महत्वपूर्ण वंशों का उदय हुआ, जिससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर की योजना अनेक बार सामान्य बुद्धि से परे होती है।
यह कथा हमें सिखाती है कि जीवन में जो घटनाएँ केवल बाधा या विघ्न प्रतीत होती हैं, वे भी कभी-कभी व्यापक लोककल्याण और दैवीय योजना का एक आवश्यक भाग होती हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति का निर्णय केवल उसके बाहरी रूप को देखकर नहीं करना चाहिए।
