▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक व्यक्ति का दिन बहुत खराब बीता। रात को उसने ईश्वर से प्रार्थना की।
उसने कहा, ‘भगवान, यदि आप नाराज़ न हों तो एक प्रश्न पूछूँ?’
भगवान मुस्कराए, ‘पूछो, क्या पूछना है?’
व्यक्ति बोला, ‘भगवान, आज मेरा पूरा दिन इतना खराब क्यों कर दिया?’
भगवान ने पूछा, ‘ऐसा क्या हुआ?’
व्यक्ति ने कहा, ‘सुबह अलार्म नहीं बजा, इसलिए देर से उठा। फिर जल्दी में निकला तो स्कूटर खराब हो गया। बड़ी मुश्किल से रिक्शा मिली। ऑफिस पहुँचा तो टिफिन साथ नहीं था और कैंटीन भी बंद थी। पूरे दिन एक खराब-सा सैंडविच खाकर गुजारा किया। फिर एक महत्वपूर्ण फोन आने वाला था, लेकिन मेरा फोन ही बंद हो गया। सोचा जल्दी घर जाकर एसी चलाकर आराम करूँ, पर घर पहुँचा तो बिजली चली गई। आखिर सारी परेशानियां मेरे साथ ही क्यों हुईं?’
भगवान ने शांत स्वर में कहा, ‘अब मेरी बात ध्यान से सुन। आज तेरे ऊपर एक बड़ी विपत्ति आने वाली थी। मैंने अपने दूत को भेजकर उसे टाल दिया। अलार्म इसलिए नहीं बजने दिया, क्योंकि रास्ते में स्कूटर से दुर्घटना होने वाली थी। कैंटीन का खाना खाने से तुझे फूड पॉइजनिंग हो जाती। जिस व्यक्ति का फोन आने वाला था, वह तुझे एक बड़े घोटाले में फँसा देता, इसलिए फोन बंद हो गया। और तेरे घर में शॉर्ट सर्किट से आग लगने वाली थी। यदि बिजली रहती तो तू सोया रहता और बड़ी अनहोनी हो सकती थी। इसलिए मैंने बिजली बंद करवा दी।’
भगवान ने मुस्कराकर कहा, ‘मैं हूं ना… यह सब मैंने तुझे बचाने के लिए किया।’
यह सुनकर व्यक्ति की आँखें भर आईं। उसने कहा, ‘भगवान, मुझसे भूल हो गई। मुझे क्षमा करें। अब मैं शिकायत नहीं करूँगा।’
भगवान बोले, ‘क्षमा माँगने की आवश्यकता नहीं। केवल विश्वास बनाए रख। मैं जो भी करता हूँ, तेरे हित के लिए ही करता हूँ। समय आने पर हर घटना का कारण समझ में आ जाता है। इसलिए मेरे कार्यों पर संदेह मत कर, श्रद्धा रख। अपने जीवन का भार अकेले मत उठाओ, उसे मेरे कंधों पर छोड़ दो।’
‘मैं हूं ना…’
