▪️छत्रपति शिवाजी महाराज , संताजी, धनाजी, कान्होजी एवं बालाजी की महागाथा
▪️पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

इन्फोमीडिया और मनोरंजन जगत की नामचीन हस्ती राघवेश अस्थाना का नया उपन्यास ‘महासमर : स्वराज्य सर्वोपरि’ छत्रपति शिवाजी महाराज के शासनकाल से आरंभ होकर अगली सदी तक की ऐतिहासिक यात्रा कराता है। इसमें शिवाजी के समकालीन और उनके बाद के प्रेरक व्यक्तित्वों संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव, कान्होजी आंग्रे तथा बालाजी विश्वनाथ की महागाथा प्रस्तुत की गई है। साथ ही 17वीं सदी के जल और थल पर लड़े गए उन भीषण युद्धों का भी सजीव वर्णन है, जिन्होंने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी।
यह कथा मध्ययुगीन भारत के महासमर की है। 14वीं से 18वीं सदी तक का भारत अनेक विषम परिस्थितियों से गुजरा। इनमें 17वीं और 18वीं सदियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहीं। शिवाजी महाराज के काल में संताजी घोरपड़े, धनाजी जाधव, कान्होजी आंग्रे और बालाजी विश्वनाथ की भूमिका अत्यंत उल्लेखनीय रही। संताजी के पिता म्हालोजी, शिवाजी महाराज के वरिष्ठ सेनानायकों में से एक थे और संभाजी महाराज के शासनकाल में कुछ समय तक प्रमुख सेनापति भी रहे। किशोरावस्था में प्रमुख सेनापति हंबीरराव मोहिते का सान्निध्य मिलने से संताजी की प्रतिभा ऐसी निखरी कि आज भी बड़े-बड़े युद्ध विशेषज्ञ उन्हें घुड़सवार सेना का अप्रतिम नायक मानते हैं।
धनाजी जाधव को अपनी बुआ तथा शिवाजी महाराज की माता जीजाबाई का संरक्षण मिला। युवावस्था में प्रतापी मराठा सेनापति प्रतापराव गुर्जर का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ और वे कम आयु में ही शिवाजी महाराज के प्रिय सरदारों में शामिल हो गए। वहीं जलसेना के महानायक कान्होजी आंग्रे ने लगभग चालीस वर्षों तक भारतीय समुद्री सीमाओं पर स्वदेशी मराठा परचम लहराया।
- ‘महासमर’ की मुख्य कथा शिवाजी महाराज के शासनकाल से आरंभ होकर अगली सदी तक पहुँचती है, किंतु 17वीं सदी की परिस्थितियाँ कैसे निर्मित हुईं, यह बताने के लिए लेखक ने उपन्यास की शुरुआत 14वीं सदी से, अर्थात तैमूर और चंगेज के वंशजों के काल से की है। इसके बाद पुस्तक के 62 उपशीर्षकों के माध्यम से मध्य भारत का सबसे बड़ा जौहर, सत्ता का संघर्ष, हुमायूँ की दिल्ली वापसी, दिल्ली का आखिरी हिंदू सम्राट, अकबर का आगरा, एक राणा-एक मिर्जा, सलीम बना जहाँगीर, खुर्रम की ताजपोशी, शाहजहाँ की संतति, हिंदवी स्वराज्य, शिवाजी की आगरा यात्रा, कानिफनाथ का अंगारा, गुरुकुल, चक्रवात, तूफ़ान, सत्ताईस वर्ष के युद्ध का आरंभ, सुवर्ण दुर्ग, आदिलशाही का पतन, कुतुबशाही का अंत, कनक दुर्ग का घेरा, मित्र सदा के लिए, चिपलूण का मुनीम, पलायन, धनाजी की शरण, ईस्ट इंडिया कंपनी का बॉम्बे, होली, एक साल का घेरा, एक चंद्रोदय और एक सूर्यास्त, प्रभानवल्ली का षड्यंत्र, रायगढ़ के आँसू, रामचंद्र पंत की युक्ति, दीदी, प्रतिशोध, चंद्री (जिंजी), भूख, चंद्री का घेरा, विचित्र द्वीप, दुर्भिसंधि, चौकी, जलदस्यु, दरार बनी खाई, गहिनाबाई, त्रिशूल का पहला फलक, त्रिकोण, चंद्री का पतन, राजाराम की वापसी, ध्वजवृंदाधिकारी, राजाराम का महाप्रयाण, शिवाजी द्वितीय की ताजपोशी, अंगरिया की अंगड़ाई, चौदह रुपए बारह आने की मजार, शाहूजी की वापसी, त्रिशूल का दूसरा फलक, कलम और तलवार, निजाम-उल-मुल्क, कैथरीन, परिवर्तन, बून की तैयारी, बून की पराजय, पेशवा तथा त्रिशूल का तीसरा फलक जैसे प्रसंगों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।
- लेखक राघवेश अस्थाना इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, टीवी चैनलों और मनोरंजन जगत की एक महत्वपूर्ण हस्ती हैं। ब्रांड कम्युनिकेशन और कंटेंट डेवलपमेंट के साथ-साथ प्रोग्रामिंग तथा निर्देशन के क्षेत्र में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। उन्होंने कई टीवी चैनलों के स्वरूप और शैली में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। यूटीवी और स्टार समूह में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र राघवेश अस्थाना वर्तमान में महुआ टीवी के प्रबंध निदेशक (एमडी) हैं। वे दक्षिण भारत के प्रमुख निर्देशकों के. बालाचंदर और टी. रामाराव के प्रधान सहायक भी रह चुके हैं तथा दक्षिण भारतीय भाषाओं में कई हजार एपिसोड का निर्देशन कर चुके हैं। यही कारण है कि उनकी लेखन शैली अत्यंत प्रभावशाली और विशिष्ट है। चाहे इतिहास हो या धर्म, वे अपनी अप्रतिम शैली के माध्यम से पाठकों पर गहरी छाप छोड़ने में सफल होते हैं।

इससे पहले उनका उपन्यास ‘अमरत्व : किसी को श्राप! किसी को वरदान’ भी काफी चर्चित रहा था। ‘महासमर’ में भी उनकी सशक्त लेखन शैली की स्पष्ट छाप दिखाई देती है। वे ऐतिहासिक घटनाओं और प्रसंगों को इतनी जीवंतता से प्रस्तुत करते हैं कि पाठक स्वयं को उसी कालखंड में उपस्थित महसूस करता है। इतिहास को औपन्यासिक स्वरूप देना सरल नहीं होता, किंतु राघवेश अस्थाना इस विधा में ऐसी दक्षता प्रदर्शित करते हैं कि पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है। ‘महासमर’ पढ़ते समय ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई उपन्यास नहीं, बल्कि एक भव्य फिल्म, टीवी सीरियल या वेब सीरीज़ आँखों के सामने सजीव रूप में चल रही हो।
पुस्तक का प्रकाशन इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नोएडा ने किया है। 258 पृष्ठों की इस कृति का मूल्य 550 रुपए है। यह पुस्तक केवल ऐतिहासिक कथाओं के शौकीन पाठकों के लिए ही नहीं, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी समान रूप से रोचक और पठनीय सिद्ध होगी-ऐसा मुझे पूरा विश्वास है।
