- सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक बुद्धिमान राजा ने लोगों की सोच और जिम्मेदारी की भावना को परखने के लिए एक अनोखा उपाय किया। उसने सड़क के बीचों-बीच एक विशाल पत्थर रखवा दिया और स्वयं पास के एक पेड़ के पीछे छिपकर देखने लगा कि आखिर कौन उस बाधा को हटाने का प्रयास करता है।
कुछ समय बाद वहाँ से राजा के दरबारी गुज़रे। उन्होंने पत्थर देखा, लेकिन उसे हटाने के बजाय रास्ता बदलकर आगे बढ़ गए। इसके बाद अनेक लोग वहाँ से निकले। किसी ने सरकार को दोष दिया, किसी ने व्यवस्था को कोसा, तो कोई बिना कुछ किए आगे बढ़ गया। लेकिन किसी ने भी पत्थर हटाने की जिम्मेदारी नहीं निभाई।
करीब डेढ़ घंटे बाद एक गरीब किसान वहाँ पहुँचा। उसके कंधे पर सब्जियों की टोकरी थी और हाथों में खेती के औज़ार। उसने बिना किसी शिकायत के अपनी पूरी शक्ति लगाकर उस भारी पत्थर को सड़क से हटा दिया।
पत्थर हटाते ही उसे नीचे एक थैला दिखाई दिया। उसमें सोने के कई सिक्के, कुछ बहुमूल्य आभूषण और एक पत्र रखा था। पत्र में राजा ने लिखा था-‘यह पुरस्कार उस व्यक्ति के लिए है, जिसने दूसरों की परेशानी को अपनी जिम्मेदारी समझकर उसका समाधान किया। यह तुम्हारी ईमानदारी, निष्ठा, परिश्रम और उत्कृष्ट चरित्र का सम्मान है।’
- शिक्षा : जीवन में आने वाली कठिनाइयाँ केवल बाधाएँ नहीं होतीं बल्कि वे हमारे धैर्य, साहस और कर्मठता की परीक्षा भी होती हैं।
