
▪️ठाणे
महाराष्ट्र के ठाणे जिले के 9वीं कक्षा के छात्र ओम डफलापुरकर ने अपने स्कूल प्रोजेक्ट के माध्यम से प्राकृतिक हेयर केयर उत्पादों और बाजार में उपलब्ध शैंपू की तुलनात्मक पड़ताल कर सभी का ध्यान आकर्षित किया है। उन्होंने शिकाकाई और रीठा के उपयोग, उनके प्रभाव और रासायनिक शैंपू के संभावित दुष्प्रभावों पर विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया।
इस अध्ययन के लिए ओम ने 15 से 40 वर्ष आयु वर्ग के करीब 500 लोगों से बातचीत की। साथ ही त्वचा रोग विशेषज्ञों, आयुर्वेदाचार्यों और सौंदर्य विशेषज्ञों से भी सलाह ली। उन्होंने पीएच स्तर और बैक्टीरिया कल्चर जैसे वैज्ञानिक पहलुओं का भी अध्ययन कर अपने निष्कर्ष तैयार किए।
अध्ययन में सामने आया कि कई व्यावसायिक शैंपू में सल्फेट, पैराबेन, फॉर्मल्डिहाइड और कृत्रिम सुगंध जैसे रसायनों का इस्तेमाल होता है। इनका लंबे समय तक उपयोग बालों और त्वचा के साथ-साथ पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।
ओम के अध्ययन के अनुसार, शिकाकाई और रीठा जैसे पारंपरिक प्राकृतिक विकल्प बालों की सफाई के साथ उन्हें पोषण भी देते हैं। इनके नियमित उपयोग से बालों का रूखापन, रूसी और बाल झड़ने की समस्या में कमी देखने को मिली।
ओम डफलापुरकर की इस शोधपरक पहल की उनके विद्यालय श्रीमती सुलोचना देवी सिंघानिया स्कूल के शिक्षकों और सहपाठियों ने सराहना की। कम उम्र में वैज्ञानिक सोच और पर्यावरण के प्रति जागरूकता दिखाने वाले इस प्रयास को प्रेरणादायक माना जा रहा है।
