
▪️मुंबई
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने देश में शिक्षा व्यवस्था और हाल के Gen Z (युवा) आंदोलनों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि युवाओं की शिकायतें वास्तविक हैं और उन्हें देशद्रोह या अराजकता की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध अपनी बात रखने का वैध माध्यम है और इसका उद्देश्य समाज में सहमति का निर्माण होना चाहिए, न कि टकराव पैदा करना।
मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी सवाल पूछती है, तर्क चाहती है और हर विषय पर खुलकर चर्चा करना चाहती है। इसलिए सरकार, समाज और शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे युवाओं की बात सुनें और उनकी समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से करें।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि यदि विद्यार्थियों की शिकायतों पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो असंतोष बढ़ेगा। भागवत ने कहा कि युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रणाली विकसित करना समय की मांग है।
आरएसएस प्रमुख ने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में विरोध का स्थान हमेशा रहेगा, लेकिन वह संयम, संवाद और राष्ट्रहित की भावना के साथ होना चाहिए। उनका मानना है कि स्वस्थ लोकतंत्र वही है, जहां सरकार और समाज युवाओं की आवाज़ को गंभीरता से सुनें और उनके साथ मिलकर समाधान तलाशें।
