
▪️मुंबई
क्या आपने कभी ऐसा सपना देखा है, जिसमें आपको यह पूरी तरह महसूस हो कि आप सपना देख रहे हैं और चाहें तो उसके घटनाक्रम को बदल भी सकते हैं? विज्ञान की भाषा में इसे ‘ल्यूसिड ड्रीमिंग’ (Lucid Dreaming) कहा जाता है। यह एक ऐसी विशेष अवस्था है, जिसमें व्यक्ति सोया होता है, लेकिन उसे इस बात की चेतना रहती है कि वह सपनों की दुनिया में है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ल्यूसिड ड्रीमिंग आमतौर पर REM (रैपिड आई मूवमेंट) नींद के दौरान होती है। इस अवस्था में मस्तिष्क के वे हिस्से, जो आत्म-जागरूकता, निर्णय लेने और सोचने से जुड़े होते हैं, सामान्य सपनों की तुलना में अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इसी वजह से व्यक्ति कई बार अपने सपनों की दिशा को प्रभावित कर सकता है या उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार बदलने का प्रयास कर सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ल्यूसिड ड्रीमिंग का उपयोग बार-बार आने वाले डरावने सपनों से राहत पाने, रचनात्मक सोच विकसित करने और मानसिक अभ्यास के लिए किया जा सकता है। हालांकि, यह हर व्यक्ति में समान रूप से नहीं होता और इसे मानसिक स्वास्थ्य का पैमाना भी नहीं माना जाता।
कुछ लोग नियमित रूप से ल्यूसिड ड्रीमिंग का अनुभव करते हैं, जबकि कई लोग विशेष अभ्यास के बाद इस अवस्था तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। इसके लिए ड्रीम जर्नल लिखना, अपने सपनों को याद रखने का अभ्यास करना और ‘रियलिटी चेक’ जैसी तकनीकों का सहारा लिया जाता है। हालांकि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि अच्छी और पर्याप्त नींद सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए कृत्रिम रूप से ल्यूसिड ड्रीमिंग करने की कोशिश हर किसी के लिए जरूरी नहीं है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि ल्यूसिड ड्रीमिंग अब केवल रहस्य या कल्पना का विषय नहीं रह गई है। आधुनिक न्यूरोसाइंस इसे चेतना की एक अनोखी अवस्था मानता है, जिस पर लगातार अध्ययन किए जा रहे हैं, ताकि यह समझा जा सके कि सोते समय भी हमारा मस्तिष्क जागरूकता और कल्पना के बीच कैसे संतुलन बनाता है।
