▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक भिखारी रेल में भीख माँग रहा था। उसकी नज़र सूट-बूट पहने एक सेठ पर पड़ी। उसने सोचा कि यह व्यक्ति अवश्य अच्छी भीख देगा। जब उसने हाथ फैलाया तो सेठ ने पूछा, ‘तुम हमेशा माँगते हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो?’
भिखारी ने कहा, ‘मैं तो भिखारी हूँ, मेरे पास देने के लिए क्या है?’ सेठ बोला, ‘मैं व्यापारी हूँ। लेन-देन में विश्वास करता हूँ। यदि तुम्हारे पास देने के लिए कुछ हो, तभी बदले में कुछ पाने का अधिकार है।’
सेठ की बात भिखारी के मन में घर कर गई। अगले दिन उसने स्टेशन के आसपास खिले फूल तोड़े और तय किया कि जो भी उसे भीख देगा, वह बदले में एक फूल देगा। लोगों को उसका यह व्यवहार अच्छा लगा। धीरे-धीरे उसे पहले से अधिक भीख मिलने लगी। उसे समझ आ गया कि केवल माँगने से नहीं, बल्कि कुछ देने से भी सम्मान और सहयोग मिलता है।
कुछ समय बाद वही सेठ फिर ट्रेन में मिला। भिखारी ने उसे भी एक फूल दिया। सेठ मुस्कुराकर बोला, ‘वाह! आज तो तुम भी मेरी तरह व्यापारी बन गए हो।’
यह सुनते ही भिखारी के भीतर जैसे नया आत्मविश्वास जाग उठा। उसने मन ही मन कहा, ‘मैं भिखारी नहीं, एक व्यापारी हूँ। मैं भी अपने जीवन को बदल सकता हूँ।’ अगले दिन से वह स्टेशन पर कभी दिखाई नहीं दिया।
एक वर्ष बाद वही सेठ एक सुसज्जित व्यापारी से मिला। उस व्यक्ति ने अपना परिचय देते हुए कहा, ‘मैं वही भिखारी हूँ। आपकी दो बातों ने मेरा जीवन बदल दिया। पहली बार आपने सिखाया कि पाने से पहले देना सीखो और दूसरी बार आपने मुझे मेरी पहचान कराई। उसी दिन मैंने तय किया कि मैं भीख नहीं, व्यापार करूँगा। आज मैं फूलों का सफल व्यापारी हूँ।’
▪️ शिक्षा : भारतीय मनीषियों ने इसलिए आत्मज्ञान पर सबसे अधिक बल दिया है। जब तक व्यक्ति स्वयं को कमजोर, असहाय या अभागा मानता है, वह वैसा ही बना रहता है। लेकिन जिस दिन वह अपनी वास्तविक क्षमता पहचान लेता है, उसी दिन उसके जीवन की दिशा बदल जाती है। आत्मज्ञान ही सफलता और परिवर्तन की पहली सीढ़ी है।
