▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार 50 लोगों का एक समूह किसी मीटिंग में हिस्सा ले रहा था। मीटिंग शुरू हुए कुछ ही मिनट हुए थे कि स्पीकर अचानक रुके और सभी प्रतिभागियों को एक-एक गुब्बारा देते हुए बोले, ‘आप सभी को इस गुब्बारे पर मार्कर से अपना नाम लिखना है।’
सभी ने ऐसा ही किया। इसके बाद सभी गुब्बारों को एक दूसरे कमरे में रख दिया गया। स्पीकर ने प्रतिभागियों से कहा कि वे कमरे में जाकर पांच मिनट के भीतर अपने नाम वाला गुब्बारा ढूंढें।
सभी लोग तेजी से कमरे में दाखिल हुए और अपना गुब्बारा ढूंढने लगे। लेकिन अफरा-तफरी के बीच किसी को भी अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिल पा रहा था। पांच मिनट बाद सभी को बाहर बुला लिया गया।
स्पीकर ने पूछा, ‘क्या हुआ? क्या किसी को अपने नाम वाला गुब्बारा नहीं मिला?’
एक प्रतिभागी ने मायूस होकर कहा, ‘नहीं! हमने बहुत ढूंढा, लेकिन हर बार किसी और के नाम का गुब्बारा ही हाथ आया।’
स्पीकर ने कहा, ‘कोई बात नहीं। अब दोबारा कमरे में जाइए। इस बार आपको जो भी गुब्बारा मिले, उसे उस व्यक्ति को दे दीजिए, जिसका नाम उस पर लिखा है।’
सभी फिर कमरे में गए। इस बार न कोई अफरा-तफरी थी और न ही किसी को अपना गुब्बारा ढूंढने की चिंता। हर व्यक्ति दूसरे का गुब्बारा उसके सही मालिक तक पहुंचाने लगा। देखते ही देखते तीन मिनट में सभी बाहर आ गए।
स्पीकर ने कहा, ‘हमारे जीवन में भी यही हो रहा है। हर कोई केवल अपनी खुशी तलाश रहा है। उसे इस बात की चिंता नहीं कि वह दूसरों को कैसे खुश कर सकता है। इसलिए बहुत कोशिशों के बावजूद उसे सच्ची खुशी नहीं मिलती।’
- शिक्षा: हमारी खुशी अक्सर दूसरों की खुशी में छिपी होती है। जब हम दूसरों को खुशी देना सीख जाते हैं, तो हमारी अपनी जिंदगी भी खुशियों से भर जाती है।
