▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक हृदय रोग विशेषज्ञ के अनुसार, एक दिन छह साल की बच्ची को उसके माता-पिता गंभीर अवस्था में लेकर आए। जांच में पता चला कि बच्ची के हृदय में रक्त का संचार बेहद कम हो चुका था। डॉक्टरों ने बताया कि ओपन हार्ट सर्जरी ही एकमात्र विकल्प है और उसके सफल होने की संभावना केवल 30 प्रतिशत है। बिना ऑपरेशन के बच्ची के पास लगभग तीन महीने का समय था।
माता-पिता ने ऑपरेशन के लिए सहमति दे दी। सर्जरी से पहले बच्ची डॉक्टर से घुल-मिल गई थी। उसकी मां उसे लगातार समझाती थी, ‘घबराना मत, भगवान बच्चों के हृदय में रहते हैं। वह तुम्हें कुछ नहीं होने देंगे।’
ऑपरेशन के दिन बच्ची ने डॉक्टर से मासूमियत से कहा, ‘डॉक्टर अंकल, मैं नहीं डर रही, क्योंकि मेरे हृदय में भगवान रहते हैं। जब आप मेरा हार्ट खोलेंगे तो देखकर बताना कि भगवान कैसे दिखते हैं।’
सर्जरी के दौरान स्थिति बेहद गंभीर मिली। हृदय में रक्त का संचार लगभग बंद था और डॉक्टरों को बच्ची को बचाने की उम्मीद नहीं दिख रही थी। तभी डॉक्टर को बच्ची की बात याद आई। उन्होंने रक्त से सने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, ‘हे ईश्वर! मेरा अनुभव इसे बचाने में असमर्थ है। यदि आप इसके हृदय में विराजमान हैं तो आप ही कुछ कीजिए।’
कुछ ही देर बाद हृदय में रक्त का संचार दोबारा शुरू हो गया। ऑपरेशन सफल रहा। डॉक्टर के लिए यह अनुभव जीवन बदल देने वाला था।
होश में आने पर उन्होंने बच्ची से कहा, ‘मुझे हृदय में भगवान दिखाई तो नहीं दिए, लेकिन यह अनुभव जरूर हुआ कि वह हर पल हृदय में मौजूद रहते हैं।’
इस घटना के बाद डॉक्टर ने ऑपरेशन थिएटर में प्रार्थना को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया और बच्चों में भी प्रार्थना व विश्वास के संस्कार विकसित करने की अपील की।
