▪️ सूर्यकांत उपाध्याय

राजा हरिश्चंद्र सूर्यवंशी और सत्यनिष्ठ राजा थे। वे सत्यव्रत के पुत्र तथा उसी रघुकुल परंपरा के महान राजा माने जाते हैं, जिसमें आगे चलकर भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। उनकी सत्यनिष्ठा और दानशीलता की प्रसिद्धि देखकर ऋषि वशिष्ठ ने उन्हें पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ सत्यवादी और दानवीर राजा बताया। विश्वामित्र ने उनके सत्य की परीक्षा लेने का संकल्प किया।
विश्वामित्र ने तपस्वी ब्राह्मण का रूप धारण कर हरिश्चंद्र से यज्ञ के लिए सहायता मांगी। राजा ने वचन दिया और बाद में अपना पूरा राज्य, धन और वैभव दान कर दिया। विश्वामित्र ने दक्षिणा में 1100 स्वर्ण मुद्राएं भी मांग लीं। राजा ने दक्षिणा देने के लिए समय मांगा और पत्नी तारा तथा पुत्र रोहित के साथ काशी चले गए।
काशी पहुंचकर उन्होंने स्वयं को एक चांडाल के यहां 500 स्वर्ण मुद्राओं में तथा पत्नी और पुत्र को एक ब्राह्मण के यहां 600 स्वर्ण मुद्राओं में सेवा के लिए सौंप दिया। इस प्रकार उन्होंने विश्वामित्र को पूरी दक्षिणा चुका दी। राजा को श्मशान में कर वसूलने का काम मिला।
समय बीतता गया। एक दिन सर्पदंश से उनके पुत्र रोहित की मृत्यु हो गई। तारा विलाप करते हुए पुत्र का शव लेकर श्मशान पहुंचीं। वहां राजा हरिश्चंद्र ने उन्हें पहचान लिया, लेकिन धर्म और कर्तव्य से विचलित नहीं हुए। उन्होंने अंतिम संस्कार के लिए श्मशान का कर मांगा। तारा के पास देने के लिए कुछ नहीं था। वे अपनी आधी साड़ी देने को तैयार हुईं।
तभी विश्वामित्र सहित सभी ऋषि-मुनि और देवता प्रकट हुए। उन्होंने बताया कि यह हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा की परीक्षा थी और वे उसमें सफल हुए हैं। उनका राज्य, धन और वैभव लौटा दिया गया तथा देवताओं के आशीर्वाद से रोहित को जीवनदान मिला।
राजा से वरदान मांगने को कहा गया तो उन्होंने केवल इतना कहा कि ऐसी कठोर परीक्षा किसी और की न ली जाए।
