▪️सूर्यकांत उपाध्याय

सृष्टि की रचना के समय जब ब्रह्मा जी ने नागों की उत्पत्ति की, तब उनमें सबसे तेजस्वी और तपस्वी अनंत शेष थे। जहाँ अन्य नाग शक्ति और वैभव की कामना करते थे, वहीं शेषनाग ने संसार से दूर रहकर केवल भगवान विष्णु का ध्यान किया। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले, ‘वत्स, वर मांगो।’
शेषनाग ने विनम्रता से कहा, ‘प्रभु! मुझे न स्वर्ग चाहिए, न राज्य और न ही कोई ऐश्वर्य। मैं केवल जीवन भर भगवान नारायण की सेवा करना चाहता हूँ।’
ब्रह्मा जी उनकी निस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्हें दो महान वरदान दिए। पहला तुम अपनी शक्ति से पृथ्वी का भार धारण करोगे। दूसरा जब-जब भगवान विष्णु धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेंगे, तब-तब तुम भी उनके साथ जन्म लेकर उनकी सेवा करोगे।
इसी वरदान के कारण त्रेता युग में भगवान श्रीराम के साथ शेषनाग लक्ष्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने चौदह वर्षों तक अपने बड़े भाई की छाया बनकर सेवा की और एक पल के लिए भी उनका साथ नहीं छोड़ा।
फिर द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया, तब शेषनाग बलराम के रूप में उनके बड़े भाई बनकर आए। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षणों तक वे श्रीकृष्ण के साथ रहे और धर्म की रक्षा में उनका साथ निभाया।
पुराणों में शेषनाग को केवल एक महान नाग ही नहीं, बल्कि धैर्य, सेवा, समर्पण और अटूट भक्ति का प्रतीक माना गया है। यही कारण है कि भगवान विष्णु विश्राम भी उनकी शैया पर करते हैं और अपने अवतारों में भी उन्हें अपने सबसे निकट स्थान देते हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के सबसे प्रिय वही बनते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के उनकी सेवा करते हैं। निष्काम भक्ति और समर्पण ही वह मार्ग है, जो भक्त को भगवान के सबसे निकट पहुँचा देता है।
