▪️सूर्यकांत उपाध्याय

वृंदावन के एक संत की कथा है। वे श्रीकृष्ण की आराधना करते थे। संसार को भूलने के लिए उन्होंने एक युक्ति अपनाई। मन निरंतर श्रीकृष्ण के स्मरण में लगा रहे, इसके लिए महात्मा ने प्रभु के साथ ऐसा संबंध जोड़ा कि वे स्वयं को नंद मानते और बाल कृष्ण को अपना पुत्र समझते।
वे लाला को लाड़ लड़ाते, यमुना स्नान करने जाते तो उन्हें साथ लेकर जाते और भोजन करने बैठते तो कन्हैया को भी साथ बैठाते। वे ऐसी भावना करते कि कन्हैया उनकी गोद में बैठा है और उनकी दाढ़ी खींच रहा है। श्रीकृष्ण के प्रति उनका वात्सल्य भाव इतना प्रबल था कि वे निरंतर उनकी मानसिक सेवा करते रहते।
पूरा दिन वे मन को श्रीकृष्ण की लीलाओं में तन्मय रखते, जिससे संसार का चिंतन करने का अवसर ही न मिले। निष्क्रिय ब्रह्म का निरंतर ध्यान करना कठिन है, लेकिन लीला-विशिष्ट ब्रह्म का ध्यान सहज हो सकता है। महात्मा ने परमात्मा के साथ पुत्र का संबंध जोड़ लिया और उसी भाव में संसार को भूल गए।
वे मन में अनुभव करते कि कन्हैया उनसे केला मांग रहा है। वे मन से ही उसे केला देते और प्रसन्न होते। कभी-कभी वे शिष्यों से कहते कि उन्होंने जीवन में गंगा-स्नान नहीं किया और एक बार काशी जाकर गंगा-स्नान करना चाहते हैं। शिष्य उन्हें काशी जाने की सलाह देते, लेकिन जब वे यात्रा की तैयारी करते, तो वात्सल्य भाव में उन्हें ऐसा अनुभव होता कि कन्हैया कह रहा है, ‘बाबा! मैं तुम्हारा छोटा-सा बालक हूं। मुझे छोड़कर काशी मत जाओ।’
महात्मा अति वृद्ध हो गए। शरीर वृद्ध हुआ, लेकिन उनका कन्हैया हमेशा बालक ही रहा। उनका बाल-भाव अंत तक स्थिर रहा। एक दिन लाला का चिंतन करते-करते उन्होंने शरीर त्याग दिया।
शिष्य कीर्तन करते हुए उन्हें श्मशान ले गए। अंतिम संस्कार की तैयारी हो रही थी कि तभी सात वर्ष का एक अत्यंत सुंदर बालक कंधे पर गंगाजल का घड़ा लेकर वहां आया। उसने कहा, ‘ये मेरे पिता हैं। मैं इनका मानस-पुत्र हूं। पुत्र होने के नाते अंतिम संस्कार करने का अधिकार मेरा है।’
बालक ने बताया कि पिता की गंगा-स्नान की इच्छा उसके कारण पूरी नहीं हो सकी, इसलिए वह गंगाजल लेकर आया है। उसने महात्मा के शव को गंगाजल से स्नान कराया, माथे पर तिलक लगाया, पुष्पमाला पहनाई और अंतिम वंदन कर अग्नि-संस्कार किया।
अग्नि-संस्कार के बाद बालक अचानक अंतर्ध्यान हो गया। तब सभी को समझ आया कि महात्मा का कोई पुत्र था ही नहीं। बाल कृष्णलाल ही उनके मानस-पुत्र बनकर आए थे। महात्मा की भावना थी कि श्रीकृष्ण उनके पुत्र हैं और परमात्मा ने उनकी भावना को सत्य कर दिया।
परमात्मा के साथ जीव जैसा संबंध जोड़ता है, परमात्मा उसी भाव से उसे स्वीकार करते हैं।
