▪️सूर्यकांत उपाध्याय

किसी गाँव के पास एक घना जंगल था। उसी गाँव में एक गरीब लकड़हारा रहता था। वह रोज जंगल से लकड़ियाँ काटकर बाजार में बेचता और अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसके पास लोहे की एक पुरानी कुल्हाड़ी थी, जो उसकी रोजी-रोटी का मुख्य सहारा थी।
एक दिन वह नदी किनारे पेड़ काट रहा था। अचानक हाथ फिसलने से उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। नदी गहरी और तेज बहाव वाली थी। लकड़हारा निराश होकर नदी किनारे बैठ गया और रोने लगा।
तभी एक देवदूत उसके सामने प्रकट हुए और रोने का कारण पूछा। लकड़हारे ने बताया कि उसकी लोहे की कुल्हाड़ी नदी में गिर गई है और वही उसके परिवार की आजीविका का साधन थी।
देवदूत नदी में गए और सोने की कुल्हाड़ी लेकर लौटे। उन्होंने पूछा, ‘क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?’ लकड़हारे ने कहा, ‘नहीं, मेरी कुल्हाड़ी लोहे की थी।’
इसके बाद देवदूत चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारे ने उसे भी अपनी कुल्हाड़ी मानने से इनकार कर दिया। तीसरी बार देवदूत उसकी वही लोहे की कुल्हाड़ी लेकर लौटे। लकड़हारे ने खुशी से कहा, ‘हाँ, यही मेरी कुल्हाड़ी है।’
उसकी ईमानदारी से प्रसन्न होकर देवदूत ने कहा, ‘तुमने लालच नहीं किया और सच का साथ दिया। इसलिए ये तीनों कुल्हाड़ियाँ तुम्हें इनाम में मिलती हैं।’
लकड़हारा खुशी से भर गया और उसने जीवनभर ईमानदारी के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।
- शिक्षा: ईमानदारी ऐसा धन है, जो जीवनभर विश्वास और सम्मान दिलाती है।
