▪️ पुस्तक समीक्षा @राजेश विक्रांत

‘तीन बत्ती के रामा’ मुंबई को रंगीन-आकर्षक पोस्टकार्ड, ग्लैमर या तड़क-भड़क की दृष्टि से नहीं, बल्कि अमीरों के घरों में काम करने वाले नौकरों की संघर्षमय, मजबूरी से भरी और कदम-कदम पर जिल्लत, अपमान व शोषण का सामना करने की लाचारी को सच के चश्मे से पेश करता है। इसमें मुंबई को उन लोगों की नजर से देखा गया है, जिन्हें मुंबई रोज देखती है, पर नोटिस नहीं करती।
इस उपन्यास के लेखक अली इमाम नकवी ईरानी कल्चर सेंटर की नौकरी से पहले सर जमशेतजी जीजीभाय (जे. जे. अस्पताल फेम) के पोते बहराम जीजीभाय के यहाँ ड्राइवर के रूप में काम करते थे। बहराम जीजीभाय का बंगला वालकेश्वर के ‘तीन बत्ती’ इलाके में था। खाली समय में लेखक को इस इलाके के घरेलू नौकरों (पुरुष नौकरों को ‘रामा’ और महिला सहायिकाओं को ‘बाई’ या ‘आया’ कहा जाता है), यानी ‘रामाओं’ के साथ बैठने, उनकी बातें सुनने, उनके जीवन, समस्याओं और परिस्थितियों का अध्ययन करने तथा उनकी विशिष्ट बोली को समझने के अवसर अक्सर मिलते थे। यही सभी समस्याएँ, परेशानियाँ और छोटी-छोटी खुशियाँ इस उपन्यास में शुरू से अंत तक नजर आती हैं। इसलिए ‘तीन बत्ती के रामा’ रामाओं की अनदेखी और अनकही दुनिया को सामने लाता है, एक ऐसी दुनिया जो चकाचौंध और ग्लैमर से दूर होते हुए भी उसका अभिन्न अंग बनी हुई है। 1991 में यह उपन्यास उर्दू में लिखा गया था। 2026 में रेख्ता प्रकाशन, नोएडा ने अनवर मिर्जा द्वारा अनुवादित इसका हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया।
इसकी पृष्ठभूमि दक्षिण मुंबई के एक प्रतिष्ठित और समृद्ध इलाके वालकेश्वर का तीन बत्ती इलाका है-
‘तीन बत्ती का इलाका एक समय अपने शांत माहौल के कारण काफी मशहूर था। शांतिपसंद पारसी लोगों ने इसीलिए तीन बत्ती और इसके आसपास अपनी कोठियाँ बनवाई थीं, लेकिन तीन बत्ती की वो खूबी अब पुरानी दास्तान बन चुकी है। अब तो वहाँ भी सूरज, मुंबई के अन्य इलाकों की तरह, शोरगुल लिए निकलता है, दिन का पहला पहर हो या दूसरा। दोपहर हो या शाम। शोर-गुल, तीन बत्ती का हिस्सा बन गया है।
रीजनल ट्रांसपोर्ट ऑफिस द्वारा साइलेंट जोन घोषित किए जाने के बाद भी तीन बत्ती पर मोटरों के हॉर्न, बसों के साइलेंसरों से निकलता काला और गाढ़ा धुआँ और उनकी कर्कश आवाज के कारण ज्यादा शोर होता है, लेकिन यह सारा शोर तब कम होने लगता है, जब दिन की सारी गतिविधियाँ शाम की जुल्फों में पनाह लेती हैं और… शाम धीरे-धीरे काली चादर ओढ़ने लगती है। नौ बजते ही घरों से वीसीआर की आवाजें सुनाई देती हैं। इमारतों के खूबसूरत हॉल की स्क्रीन पर कुछ बेडौल वजूद नजर आते हैं। फोन का रिसीवर कानों से लगाए, बगलें खुजाते, जांघ खुजाते।
कभी-कभी उनकी जगह नाजुक सुंदरियाँ ले लेतीं, जुल्फें खोले, जींस से ढकी जांघें दिखाती हुई। उन पर नजर पड़ते ही रिज रोड पर चलने वाले पल भर को रुकते हैं। कोई मनचला सीटी बजाता है और कोई एक-आधा जुमला उनकी तरफ उछाल देता है। वक्त कुछ और आगे बढ़ता है। तब उन्हीं इमारतों के वे दरवाजे जाग जाते हैं, जो नौकरों के आने-जाने के लिए होते हैं। फ्लैटों में काम करने वाले नौकर आपस में चर्चा करते हैं। और उनमें एक सवाल बड़ा ही अहम हुआ करता है—
‘जमी लीधो…?’
‘जेवण झाला काय…?’
‘हैव यू टेकन योर डिनर…?’
‘खाना खा चुके…?’
बस… भाषा बदल जाती है। सवाल एक ही होता है और आमतौर पर जवाब भी… हाँ, कभी-कभी जवाब बदल जाता है। उस वक्त, जब किसी फ्लैट में पार्टी वगैरह का हंगामा होता है। तब नौकर अपने मालिक की फिजूलखर्ची का जिक्र करते हैं या उसकी दरियादिली का। और जब रात अपना पहला पहर खत्म करती है, तब आयाएँ जमीन पर दरी बिछाकर पड़ी रहती हैं। लड़के और मर्द, नहा-धोकर, सेठ-सेठानियों से नजर बचाकर… या गिफ्ट में मिलने वाले पाउडर… और लेवेंडर से सजकर इमारत की पिछली सीढ़ियों से उतर पड़ते हैं। कुछ इधर-उधर चले जाते हैं और कुछ तीन बत्ती के आसपास की इमारतों के बाहर किसी दुकान या होटल के चबूतरे को आबाद करते हैं।
पारसी परिवारों में आमतौर पर ईसाई नौकर होते हैं या फिर गुजरात के, बनियों और मारवाड़ियों के घरों में मराठी आयाएँ और लड़के होते हैं। आयाओं को वे ‘बाई’ और लड़कों को ‘रामा’ कहते हैं। सिंधी परिवारों में भी मराठी औरतें और रामा रखे जाते हैं और दो-चार अंग्रेज परिवार जो इस इलाके में आबाद हैं, वे दक्षिण भारतीय नौकर रखते हैं। लेकिन सभी काम करने वालों में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा, जो तीन बत्ती के आसपास की इमारतों के चबूतरों पर हाजिरी न देता हो।’
धोंडू, अन्नू, विनय, मोहन, राजाराम, सक्कू बाई और चैत नारायण आदि रामाओं और आयाओं की हसरत, बेबसी और सपनों को इस कृति में चित्रित किया गया है। इस उपन्यास की सबसे खास विशेषताओं में से एक इसकी भाषा यानी मुंबइया बोली है, जो हिंदी, उर्दू, गुजराती, मराठी, अवधी और भोजपुरी का मिश्रण है। इसका सहज और सटीक प्रयोग इसमें किया गया है, जिससे कथा जीवंत हो उठती है। इसके कुछ उदाहरण यूं हैं –
‘बाटली एकदम भरेला है, उबल जाएंगा।’
‘अभ्भी थोड़ा दिन आगल पेट गिराई। तेरे को मालूम किसका? उसके सेठ का।’
‘बस… अपुन को मिल गया चानस।’
‘लगता हैं उसका रुमाल ठंडा हो गया।’
‘आया की पगार तो गीलाइच होंगा ही? सूखा पगार खाली ड्राइवर का होता, समझा क्या?’
‘अपुन भी यही खेलेंगा भिड़ू… ओपन क्लोज पाना का लफड़ा खल्लास।’
ये रामा कोई पढ़े-लिखे नहीं हैं, पर इनके अंदर मनुष्यता कूट-कूटकर भरी हुई है। एक रामा के परिवार पर मुसीबत आ जाती है और सेठ एडवांस देने से मना कर देता है, तो अन्य रामा मिल-जुलकर पैसे जमा करके उसकी मदद करते हैं। मोहन की बहन की शादी के लिए धोंडू अपने सेठ से 2,000 रुपए माँगकर देता है।
यह कृति न केवल समाज के एक उपेक्षित वर्ग की कहानी बयाँ करती है, बल्कि उनके भीतर छिपी भावनाओं, संघर्षों और वास्तविकताओं को भी उजागर करती है। इसमें सेठानी या सेठानी की छोकरी को लेकर रामाओं की फैंटेसी, सपने और सच तो हैं ही, आयाओं का सेठों द्वारा यौन शोषण भी है।
‘लोनावला में दो दिन की मस्ती के बाद सक्कू को 500 रुपए मिले। सेठ के बंगले की तरफ लौटते हुए सेठ की उँगलियाँ उसके ब्लाउज में उतर जाती हैं। वह अपने बदन में कंपन महसूस करती है, लेकिन नोटों की चुभन उसे सामान्य कर देती है। वह मुस्कुराकर सेठ की तरफ देखती है और फिर अनजाने में उसकी आँखें बैक-व्यू मिरर की तरफ उठ जाती हैं। प्रकाश की पुतलियाँ अब भी सक्रिय हैं।’
लेखक अली इमाम नकवी ने इस उपन्यास के जरिए संभ्रांत वर्ग की चमक-दमक के पीछे छिपे वीभत्स चेहरे को उल्लेखनीय सूक्ष्मता, साफगोई और संवेदनशीलता से चित्रित किया है। विषयवस्तु की दृष्टि से यह उपन्यास उर्दू साहित्य में एक अनूठा और महत्वपूर्ण योगदान है, जो पाठकों को एक नया और सम्मोहक अनुभव प्रदान करता है। नकवी की भाषा सरल और सहज है तथा शैली ऐसी है कि जैसे पाठक कोई फिल्म देख रहा हो।
