▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक सेठ और सेठानी में झगड़ा हो गया। वे बच्चे नहीं थे, अधेड़ थे। पर आखिर थे तो पति-पत्नी ही। और वे पति-पत्नी ही क्या, जिनमें झगड़ा न हो! लेकिन इन दोनों में तो तगड़ा झगड़ा हो गया। इतना कि तलाक की नौबत आ गई। बच्चे बेचारे परेशान हो गए। आखिर हारकर बच्चों ने अपने पिता जी के गुरु जी तक सूचना भिजवाई।
गुरु जी आए। पति-पत्नी दोनों को बिठाया। कुछ उनकी सुनी, कुछ अपनी सुनाई और समझा-बुझाकर सुलह करवा ही दी। अब मामला सुलझ गया तो दोनों सामान्य हो गए।
सेठ ने सेठानी से कहा, ‘चल, उठ अब। फटाफट गुरु जी के लिए नाश्ता लगा।’
सेठानी रसोई में चली गई और सेठ गुरु जी का धन्यवाद करते हुए कहने लगा, ‘गुरु जी! ये बड़ी मूर्खा है। इसे बोलने की तमीज नहीं है। जो मुँह में आता है, बकती है। इतना कि मैं सुन नहीं पाता और मुझे गुस्सा आ जाता है। चलिए, छोड़िए इस बात को। अच्छा हुआ, आप आ गए। अब आप कुछ दिन यहीं ठहरें। हमें सेवा का मौका दें। और वैसे भी आजकल शहर में रामलीला चल रही है। रोज रात आपको रामलीला दिखाने ले चला करूँगा।’
गुरु जी ने कहा, ‘रामलीला? बचपन में गाँव में रामलीला होती थी, तब देखा करता था। यह तो बड़ी सुंदर बात है कि तुम्हें भी रामलीला देखना अच्छा लगता है।’
सेठ बोला, ‘अच्छा लगता है? गुरु जी, मैं तो कई साल पहले तक खुद भी रामलीला में अभिनय करता रहा हूँ।’
गुरु जी ने पूछा, ‘अच्छा! तो तुम रामलीला में क्या बनते थे?’
सेठ जी ने झेंपते हुए कहा, ‘अब यह तो मेरा चेहरा देखकर ही आप समझ सकते हैं कि मैं राक्षस बना करता था।’
गुरु जी बोले, ‘एक बात है। जब तुम राक्षस बनते थे, तब जो कलाकार वानर बनते थे, वे तुम्हें बुरा-भला भी कहते होंगे?’
सेठ बोला, ‘आप कहने की बात कर रहे हैं? वे तो कई बार मार भी दिया करते थे।’
गुरु जी ने पूछा, ‘अच्छा? तब तो तुम्हें बड़ा गुस्सा आता होगा?’
सेठ बोला, ‘नहीं-नहीं, गुरु जी। आप कैसी बात करते हैं? इसमें गुस्से की कौन-सी बात है? वह तो रामलीला है ना!’
गुरु जी मुस्कुराए और बोले, ‘अच्छा! वहाँ तो रामलीला चलती थी, यहाँ क्या तुम्हारे बाप की लीला चल रही है?’
संतजन कहते हैं कि यहाँ भी रामलीला ही चल रही है। सारा जगत राम जी की लीला ही है। यदि यह बात समझ में उतर जाए, तब यहाँ चाहे जो भी हो जाए, क्रोध का यहाँ क्या काम है?
