▪️सूर्यकांत उपाध्याय

महानगर के आखिरी बसस्टॉप पर कंडक्टर ने बस रोकी तो नीचे खड़े एक देहाती बुजुर्ग ने हाथ बढ़ाकर बस में चढ़ने की कोशिश की। एक हाथ से सहारा लेते हुए वे डगमगाते कदमों से चढ़े, जबकि दूसरे हाथ में भगवान गणेश की बेहद मनोहर बालमूर्ति थी।
बस में पैर रखने की जगह नहीं थी। बुजुर्ग को असहज देखकर कंडक्टर ने अपनी सीट खाली करते हुए कहा, ‘दद्दा, आप यहां बैठ जाइए।’ बुजुर्ग मूर्ति को सीने से लगाकर बैठ गए। कुछ ही देर में बाल गणेश सबके आकर्षण का केंद्र बन गए।
कंडक्टर ने पूछा, ‘कहां जाओगे दद्दा?’ बुजुर्ग ने पैसे निकालने की कोशिश की तो कंडक्टर बोला, ‘अभी रहने दीजिए, उतरते समय दे दीजिएगा।’
कुछ देर बाद कंडक्टर ने पूछा, ‘दद्दा, गांव में भी गणेश की मूर्तियां मिलती हैं। फिर इतनी दूर से इसे क्यों ले जा रहे हैं?’
बुजुर्ग मुस्कराए, ‘मिलती तो हैं बेटा, लेकिन ऐसी नहीं। पंद्रह साल पहले हम पति-पत्नी इसी शहर में आए थे। हमारी कोई संतान नहीं थी। एक बार गणेशोत्सव के लिए मूर्ति लेने आए तो मेरी पत्नी की नजर ऐसी ही मूर्ति पर पड़ी। उसने उसे सीने से लगाकर कहा, ‘मेरा बच्चा!’ उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। तभी से हर साल इसी सांचे की मूर्ति घर ले जाते हैं। दो साल पहले तक वह भी साथ आती थी, लेकिन अब घुटनों के दर्द से चल नहीं पाती। फिर भी मैं उसका यह सुख नहीं छीनना चाहता।’
एक महिला ने पूछा, ‘फिर विसर्जन कर देते हैं?’
दद्दा की आंखें भर आईं। ‘हां, विधि-विधान से करते हैं। लेकिन इन दस दिनों में वह इसे बच्चे की तरह रखती है—कपड़े, बर्तन सब तैयार रहते हैं।’
गांव आने पर दद्दा ने मूर्ति संभाली और कंडक्टर को पैसे देते हुए कहा, ‘लो बेटा, डेढ़ टिकट काटना।’
कंडक्टर चौंका, ‘आप तो अकेले हैं!’
दद्दा मुस्कराए, ‘दोनों आए हैं—एक मैं और एक मेरा बाल गणेश।’
यह सुनकर बस में सन्नाटा छा गया। दद्दा मूर्ति को दोनों बांहों में थामकर नन्हे बच्चे की तरह पगडंडी पर उतर गए।
