▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्यालय के बगीचे में गंगादास तेज धूप और गर्मी की परवाह किए बिना पेड़-पौधों की छँटाई में जुटा था। तभी चपरासी ने आवाज लगाई, “गंगादास! प्रधानाचार्या जी तुम्हें तुरंत बुला रही हैं।”
गंगादास घबरा गया। वह ईमानदारी और निष्ठा से अपना काम करता था। न जाने क्या गलती हो गई, यह सोचता हुआ वह प्रधानाचार्या के कार्यालय पहुँचा।
“मैडम, आपने बुलाया था?”
“हाँ, आओ और यह कागज पढ़ो,” प्रधानाचार्या ने सख्त आवाज में कहा।
गंगादास ने घबराकर जवाब दिया, “मैडम, मुझे अंग्रेजी पढ़नी नहीं आती। मुझसे कोई गलती हुई हो तो क्षमा कर दीजिए। आपने मेरी बेटी को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की अनुमति दी है। मैं आपका बहुत आभारी हूँ।”
प्रधानाचार्या ने उसे शांत किया और उसकी बेटी की कक्षा-अध्यापिका को बुलाया। उन्होंने बताया कि मातृ दिवस पर बच्चों से अपनी माँ के बारे में लेख लिखने को कहा गया था। अब अध्यापिका गंगादास को उसकी बेटी का लेख पढ़कर सुनाने लगीं।
लेख में लिखा था कि गाँव में डॉक्टरों की कमी के कारण जन्म देते समय उसकी माँ की मृत्यु हो गई थी। परिवार के लोग उसे माँ की मौत का दोषी मानते थे, लेकिन उसके पिता ने उसे गले लगाया और माँ का प्यार दिया। दादा-दादी के दोबारा विवाह करने के दबाव को ठुकराने पर पिता ने घर-खेती छोड़ दी और शहर आकर इसी विद्यालय में माली का काम करने लगे।
बेटी ने लिखा था कि पिता अपनी जरूरतें त्यागकर उसकी हर इच्छा पूरी करते हैं। वे अक्सर उसकी पसंद की चीजें यह कहकर खाने से मना कर देते हैं कि उन्हें वह पसंद नहीं, जबकि वास्तव में वे उसके लिए आखिरी टुकड़ा छोड़ देते हैं।
उसने लिखा, “यदि प्यार, देखभाल, दया और त्याग माँ की पहचान हैं, तो मेरे पिताजी संसार की सबसे अच्छी माँ हैं। आज मातृ दिवस पर मैं उन्हें शुभकामनाएँ दूँगी। मुझे गर्व है कि हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली मेरे पिता हैं।”
लेख समाप्त होते-होते अध्यापिका का गला भर आया। कार्यालय में सन्नाटा छा गया। गंगादास की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने कागज को सीने से लगा लिया।
प्रधानाचार्या ने उसे कुर्सी पर बैठाया और कहा, “तुम्हारी बेटी को इस लेख के लिए पूरे दस में से दस अंक मिले हैं। विद्यालय प्रबंधन ने मातृ दिवस समारोह में तुम्हें मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान तुम्हारे प्यार, देखभाल, दया और त्याग का है। एक अच्छा अभिभावक बनने के लिए महिला होना जरूरी नहीं।”
यह सुनकर गंगादास रो पड़ा। वह अपनी बेटी की कक्षा के बाहर पहुँचा और आँसुओं से भरी आँखों से उसे निहारता रहा।
संसार की सभी प्यारी बेटियों और उनके त्यागमयी अभिभावकों को समर्पित।
