▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक गाँव में धर्मदास नाम का व्यक्ति रहता था। वह पिछले बीस वर्षों से नियमित रूप से सत्संग में जाता और महाराज जी के प्रवचन ध्यान से सुनता था। गाँव के लोग उसे बड़ा ज्ञानी और भक्त मानते थे। हालांकि, घर लौटते ही वह नौकरों पर चिल्लाता, माता-पिता से कटु वचन बोलता और पड़ोसियों से झगड़ता था। उसके भीतर क्रोध, लोभ और अहंकार भरा हुआ था।
एक दिन धर्मदास ने महाराज जी से पूछा, ‘मैं बीस वर्षों से सत्संग सुन रहा हूँ। शास्त्रों की बातें भी याद हैं, फिर भी मन को शांति क्यों नहीं मिलती? मुझे सच्चे ज्ञान की प्राप्ति क्यों नहीं हुई?’
महाराज जी मुस्कुराए और बोले, ‘धर्मदास, नदी किनारे जाओ और इस कोयले से भरी छिद्रों वाली टोकरी में पानी भरकर ले आओ।’
धर्मदास ने कई बार प्रयास किया, लेकिन टोकरी में पानी ठहर नहीं पाया। निराश होकर वह लौट आया और बोला, ‘महाराज जी, इसमें पानी रुक ही नहीं सकता।’
महाराज जी ने कहा, ‘ध्यान से देखो, पानी भले ही नहीं रुका, लेकिन बार-बार नदी में डुबोने से कोयले की कालिख धुल गई और टोकरी साफ हो गई।’
फिर उन्होंने समझाया, ‘सत्संग भी पानी की तरह है। तुम प्रवचन सुनते तो हो, लेकिन बाहर निकलते ही क्रोध, अहंकार और द्वेष तुम्हारे भीतर के ज्ञान को बहा ले जाते हैं। सत्संग का उद्देश्य केवल सुनना नहीं, बल्कि उसके विचारों को आचरण में उतारना है।’
यह सुनकर धर्मदास को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने उसी दिन से अपने व्यवहार में बदलाव लाने का संकल्प लिया। वह समझ गया कि सच्चा ज्ञान दूसरों के प्रति प्रेम, दया और विनम्रता अपनाने में है।
- सीख: हजारों प्रवचन सुनने से भी जीवन नहीं बदलता, जब तक उनके विचार आचरण में न उतरें। सच्चा सत्संग वही है, जो मन के विकार मिटाकर इंसान को बेहतर बनाए।
