▪️सूर्यकांत उपाध्याय

मेरे मकान की चारदीवारी कुछ नीची है। घर के ठीक सामने सड़क के बीचोंबीच डिवाइडर है, जहां अक्सर रात के समय सड़क पर रहने वाले कुछ लोग अपना बसेरा बना लेते हैं।
घर के बाहरी बरामदे में पापा ने डम्ब केन के पौधे लगा रखे हैं। इनके गहरे हरे रंग और बड़ी-बड़ी पत्तियों की खूबसूरती देखते ही बनती है। आने-जाने वाले लोग भी इन पौधों को देखकर आकर्षित होते हैं। हालांकि, ये पौधे बेहद नाजुक हैं। थोड़ी-सी ठंड पड़ते ही इनके पत्ते मुरझाकर पीले होने लगते हैं। इसलिए सर्दियों में पापा गमलों को बाहर से उठाकर अंदर बरामदे में दीवार के पास रख देते हैं और रात में चारों ओर से चादरों से ढक देते हैं, ताकि पौधों को ठंड से बचाया जा सके।
एक दिन सुबह मेरी नींद खुली तो देखा कि पापा घर के नौकर काली को जोर-जोर से डांट रहे थे। पता चला कि पिछली रात काली पौधों को ढकना भूल गया था और चादर भी गायब थी। पापा बार-बार पूछ रहे थे कि चादर आखिर गई कहां?
काली चुपचाप सिर झुकाए खड़ा था। तभी मेरी नजर सड़क पर सो रही एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी। वह हमारी चादर ओढ़े हुए थी।
मैंने पापा से कहा, “पापा, जरा उधर देखिए!”
चादर को महिला के ऊपर देखकर पापा गुस्से से बोले, “यह क्या है, काली?”
काली ने सिर झुकाकर कहा, “मालिक, आज मेरी मां मेरे साथ नहीं है। शायद इसीलिए मैं यह सब कर रहा हूं। वह बुजुर्ग महिला भी किसी की मां होगी। अगर ठंड से उसकी जान चली गई, तो उसके बच्चे भी अनाथ हो जाएंगे। इसी सोच के कारण मैंने पौधों को ढकने के बजाय उस महिला को चादर ओढ़ा दी। मुझसे गलती हो गई, मालिक। आगे से ऐसा नहीं होगा।”
काली की बात सुनते ही पापा का गुस्सा शांत हो गया। उनकी आंखें नम हो गईं। उन्होंने काली को गले लगाते हुए कहा, “बेटा, तुम्हारे भीतर परोपकार की जो भावना है, वह तुम्हें मुझसे भी ज्यादा समझदार बनाती है। तुमने बिल्कुल सही किया। पौधों से ज्यादा कीमती इंसान की जान है।”
