▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार कांची कामकोटि पीठ के जगद्गुरु शंकराचार्य जी से एक व्यक्ति ने प्रश्न किया कि हम भगवान को भोग क्यों लगाते हैं? हम जो प्रसाद चढ़ाते हैं, उसमें से भगवान क्या ग्रहण करते हैं? जब उसके रंग, रूप, स्वाद और मात्रा में कोई बदलाव नहीं होता, तो भोग लगाने की परंपरा का क्या औचित्य है? क्या यह महज एक पाखंड नहीं है?
शंकराचार्य जी ने शांत भाव से उत्तर दिया। उन्होंने समझाया कि भोग लगाने का वास्तविक अर्थ वस्तु में परिवर्तन करना नहीं, अपितु मनुष्य के भीतर के अहंकार को समाप्त करना है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति लड्डू लेकर मंदिर जाता है और रास्ते में कोई पूछता है कि यह क्या है, तो वह कहता है कि लड्डू है और मेरा है। लेकिन वही लड्डू भगवान के चरणों में अर्पित करने के बाद जब कोई पूछता है कि यह क्या है और किसका है, तो उसका उत्तर होता है- यह प्रसाद है और भगवान का है।
लड्डू वही रहता है। उसके रंग, स्वाद और आकार में कोई बदलाव नहीं आता, लेकिन उसके प्रति मनुष्य का भाव बदल जाता है। पहले उसमें ‘मेरा’ होने का अहंकार था, अब उसमें भगवान के प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव है।
यही भोग लगाने का आध्यात्मिक संदेश है। भगवान को अर्पित करने से मनुष्य में विनम्रता, कृतज्ञता और सेवा का भाव विकसित होता है। वह हर वस्तु को अपनी संपत्ति मानने के बजाय ईश्वर की कृपा समझने लगता है।
इसलिए भोग लगाना केवल धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि अहंकार त्यागने और मन को निर्मल बनाने की साधना भी है।
