▪️सूर्यकांत उपाध्याय

एक लोक प्रचलित कहानी है।
वर्ष 1980 में उत्तर प्रदेश के तुलसी गांव में काशी से आई रामलीला मंडली ने एक ऐसी लीला का मंचन किया, जिसकी कहानी आज भी लोगों को भावविभोर कर देती है।
मंडली के संचालक पंडित कृपाराम दूबे हारमोनियम पर रामलीला का संचालन करते थे, जबकि फौजदार शर्मा मंच, वेशभूषा और शिव धनुष तैयार करने की जिम्मेदारी संभालते थे।
एक दिन पंडित जी ने सुझाव दिया कि राम का पात्र निभाने वाला बाल कलाकार छोटा है, इसलिए धनुष हल्का बनाया जाए। फौजदार ने इसे अपना अपमान समझ लिया। बदला लेने के लिए उसने लकड़ी के धनुष की जगह लोहे की भारी छड़ से बना धनुष रख दिया।
रात को सीता स्वयंवर का मंचन शुरू हुआ। सभी राजा धनुष उठाने में असफल रहे। जब 17 वर्षीय राम बने कलाकार की बारी आई तो वह धनुष हिला भी नहीं सका। उसकी घबराहट देखकर पंडित जी स्थिति समझ गए। उन्होंने आंखों से उसे धनुष की परिक्रमा करने का संकेत दिया और प्रभु श्रीराम से मंडली की लाज रखने की प्रार्थना की।
इसके बाद पंडित जी ने हारमोनियम पर भक्ति के स्वर छेड़े और रामचरितमानस की चौपाई गाने लगे-
‘लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़े
काहू न लखा देख सब ठाढ़े’
चौपाई पूरी होते ही अचानक तेज आवाज हुई और लोहे का धनुष दो टुकड़ों में टूट गया। पूरा पंडाल ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से गूंज उठा।
पंडित जी भावविभोर होकर मंच पर दंडवत हो गए। पर्दे के पीछे खड़ा फौजदार भी यह दृश्य देखकर स्तब्ध रह गया और उसका अहंकार चूर हो गया।
- सीख : सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नही। गहरी आस्था दैवीय शक्ति को प्रकट करने का सामर्थ्य रखती है।
