▪️जानिए यमदीप दान की मान्यता और पौराणिक कथा

धनतेरस को आमतौर पर धन, आरोग्य और समृद्धि के पर्व के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इस दिन एक ऐसी परंपरा भी निभाई जाती है जिसका सीधा संबंध जीवन की सुरक्षा और दीर्घायु की कामना से है। इसे यमदीप दान कहा जाता है। मान्यता है कि धनतेरस की संध्या पर घर के बाहर यमराज के निमित्त दीपक जलाने से परिवार पर अकाल मृत्यु का संकट नहीं आता और घर के सदस्यों को दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
- क्या है यमदीप जलाने की विधि?
धार्मिक परंपरा के अनुसार, धनतेरस की शाम घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक रखा जाता है। दक्षिण दिशा को यमराज की दिशा माना गया है। इस दीपक में सरसों या तिल का तेल डालकर बत्ती जलाई जाती है। दीप प्रज्वलित करते समय यमराज से परिवार की सुख-शांति, आरोग्य और लंबी आयु की प्रार्थना की जाती है। इसे यमदीप दान कहा जाता है।
- यमदीप और नरक चतुर्दशी के दीपक में क्या है फर्क?
धनतेरस पर जलाया जाने वाला यमदीप और नरक चतुर्दशी पर किया जाने वाला दीपदान धार्मिक दृष्टि से अलग महत्व रखते हैं। धनतेरस का यमदीप विशेष रूप से यमराज को समर्पित होता है। इसके माध्यम से परिवार की सुरक्षा और अकाल मृत्यु से बचाव की कामना की जाती है। वहीं नरक चतुर्दशी पर दीपदान की परंपरा भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध और पितरों के प्रति श्रद्धा से भी जुड़ी हुई है। दोनों ही अवसरों पर दीप प्रज्वलित करना शुभ माना जाता है।
यमदीप दान की परंपरा जीवन के महत्व और परिवार के मंगल की कामना का प्रतीक है। धार्मिक आस्था के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक दीपक जलाकर यमराज से परिवार के सभी सदस्यों के स्वस्थ और दीर्घायु होने की प्रार्थना की जाती है।
