▪️सूर्यकांत उपाध्याय

नंद महल का विशाल आँगन उस दिन अद्भुत छटा बिखेर रहा था। प्रातःकाल की सुनहरी किरणें नक्काशीदार स्तंभों, पत्थर की सीढ़ियों और फूलों से सजी लताओं को आलोकित कर रही थीं। वातावरण में ताजे फूलों की सुगंध और ब्रज की मधुर शांति घुली हुई थी।
माँ यशोदा लाल और सुनहरी किनारी वाली साड़ी पहने सीढ़ियों पर खड़ी थीं। उनका नन्हा लाड़ला कृष्ण प्रेमपूर्वक उनका हाथ थामे हुए था। नीलवर्ण शरीर पर पीतांबर, सिर पर मोरपंख से सजा मुकुट, गले में पुष्पमाला और छोटे-छोटे स्वर्ण आभूषण कान्हा की बाल-सुलभ सुंदरता को और निखार रहे थे। यशोदा मैया की आँखों में पुत्र के प्रति असीम स्नेह था, तो कृष्ण की मुस्कान में माँ के सान्निध्य का निश्छल आनंद झलक रहा था।
आँगन में मिट्टी के सुंदर मटकों में दूध, दही और माखन सजा था। कुछ मटकों को फूलों से सजाया गया था। पास ही पीतल की पारंपरिक तराजू ब्रज के घरेलू जीवन की झलक प्रस्तुत कर रही थी। आँगन के एक ओर तीन गोपियाँ हाथ जोड़कर बाल कृष्ण को निहार रही थीं। उनके चेहरों पर श्रद्धा और भक्ति का भाव था।
विशाल वृक्षों की छाया में गौएँ और बछड़े विश्राम कर रहे थे। उनके गलों में बंधी घंटियों की मधुर ध्वनि, फूलों से लदे वृक्ष और नक्काशीदार मेहराबें पूरे वातावरण को दिव्य बना रही थीं।
माँ यशोदा के लिए दूध, दही और माखन केवल घरेलू वस्तुएँ नहीं, अपितु अपने लाड़ले के प्रति प्रेम और समर्पण के प्रतीक थे। वह अपने कान्हा को संसार का हर सुख देना चाहती थीं।
वास्तव में, यह दृश्य केवल माँ और पुत्र के प्रेम का चित्रण नहीं, अपितु भक्ति के उस अनूठे स्वरूप का प्रतीक है, जहाँ स्वयं परमात्मा भी भक्त के प्रेम में बंधकर बालक बन जाते हैं। यशोदा की उँगली थामे कृष्ण की मुस्कान यही संदेश देती है कि ईश्वर को पाने का सबसे सरल मार्ग निश्छल प्रेम और वात्सल्य है।
