■ सूर्यकांत उपाध्याय

आज के समय में हर कोई अपने आप को दूसरों से बेहतर दिखाने की दौड़ में लगा है। शादी, जन्मदिन या कोई भी छोटा-बड़ा आयोजन, मानो अब यह सब “प्रतिष्ठा” का सवाल बन गया है। ऐसा ही कुछ हुआ मिश्रा परिवार के साथ, जिन्होंने अपने बेटे अमन की शादी में अपनी पूरी जमा पूंजी लगा दी।
मिश्रा जी एक साधारण सरकारी कर्मचारी थे। उनके दो बच्चे अमन और राधा। अमन की शादी तय हुई तो घर में खुशी का माहौल था, लेकिन वही खुशी धीरे-धीरे “प्रतिष्ठा की होड़” में बदलने लगी
रिश्तेदारों और समाज के लोग कहने लगे, “मिश्रा जी, आजकल बिना फाइव स्टार होटल के शादी का मजा ही क्या!”
“अरे, बारात में डीजे, आतिशबाजी और फ्लोरल एंट्री न हो तो लोग बातें बनाएंगे…”
मिश्रा जी शुरू में शांत रहे पर धीरे-धीरे समाज का दबाव उन पर हावी हो गया। उन्होंने बैंक से लोन लिया, फिक्स डिपॉजिट तोड़ दी और अमन की शादी को “ग्रैंड इवेंट” बनाने में जुट गए। हजारों लोगों का खाना, महंगे गिफ्ट, सजावट, डांस कार्यक्रम और डिजाइनर कपड़े सबकुछ शान-ओ-शौकत से हुआ।
शादी खत्म होते-होते मिश्रा जी का हर कोना कर्ज में डूब चुका था। महीनों तक उन्होंने बैंक के नोटिस झेले। अमन और उसकी पत्नी स्नेहा को भी नौकरी ढूंढकर खर्च संभालने के लिए संघर्ष करना पड़ा। परिवार का चैन, हंसी और आपसी सुकून सब गायब हो गया।
एक दिन मिश्रा जी की तबीयत खराब हो गई। डॉक्टर ने कहा, “तनाव और अधिक चिंता की वजह से हृदय कमजोर हो गया है।” अस्पताल के बेड पर लेटे मिश्रा जी सोच रहे थे, “क्या दिखावे की खुशी इतनी जरूरी थी? जो आज हमारे परिवार को बरबादी की कगार पर ले आई?”
उस रात अमन पिता के पास बैठा था। उसने कहा, “पापा, अगर हम सादगी से शादी करते तो यह हाल न होता। आज हम सब कर्ज में हैं और खुशी कहीं खो गई है।”
मिश्रा जी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने बेटे का हाथ पकडकर कहा, “बेटा, समाज के दिखावे ने हमें अंधा कर दिया। अब हमें खुद ही सीखना होगा कि सादगी ही सच्चा सुख है।”
अगले दिन उन्होंने मोहल्ले की बैठक बुलाई। सबके सामने बोले, “मैंने अपनी गलती से सीखा है। शादी या कोई भी खुशी का मौका दिखावे का नहीं, दिलों को जोड़ने का होता है। जो पैसा हमने दूसरों को प्रभावित करने में खर्च किया, अगर वही हम अपने बच्चों के भविष्य या समाज के कल्याण में लगाते तो सच्चा गर्व होता।”
उनकी बातें सुनकर कई लोग सोच में पड़ गए। कुछ महीनों बाद उनकी बेटी राधा की शादी हुई तो मिश्रा जी ने छोटा, सादा सा कार्यक्रम किया।
न कोई महंगी सजावट, बस अपनों के बीच स्नेह और सरलता।
उस दिन मिश्रा परिवार ने सच में “शादी” की जिसमें प्रेम था, अपनापन था और मन की सच्ची खुशी।
शिक्षा: दिखावा क्षणिक सुख देता है पर सादगी जीवनभर की शांति।
