■ सूर्यकांत उपाध्याय

निधि की शादी को मुश्किल से दो महीने ही हुए थे, जब डॉक्टरों ने सासु माँ कमला देवी की बीमारी बताई, “दिमाग धीरे-धीरे कमजोर पड़ेगा… याददाश्त पर असर होगा… कभी पहचानेंगी, कभी नहीं।”
यह सुनकर निधि को लगा कि उसकी नई गृहस्थी पर किसी ने भारी बोझ रख दिया हो। पर कमला देवी ने अपनी बीमारी को कभी बहाना नहीं बनाया। वे हर काम मुस्कुराकर करतीं, हाँ, कभी बेटे का नाम भूल जातीं, कभी किसी रिश्ते का। कुछ दिन तो बहू को भी पहचान नहीं पातीं।
बीमारी बढ़ती गई। घर के अन्य सदस्य अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त। पति दफ्तर में और बच्चे अभी हुए नहीं थे। देखते-देखते आठ साल बीत गए।
इन आठ वर्षों में घर की असली देखभाल निधि ही करती रही दवाइयाँ, नहलाना, कपड़े बदलना, खाना खिलाना, रातों को उठकर देखना कि सासु माँ कहीं गिर न जाएँ… सब बिना किसी शिकायत के।
कमला देवी कभी उसे “बहू” कहतीं, कभी “बेटी” और कभी पहचान ही नहीं पातीं। निधि को बुरा नहीं लगता; वह बस चाहती कि सास ठीक हो जाएँ।
फिर 49 दिन पहले, एक रात सासु माँ का हाथ बर्फ जैसा ठंडा लगा। सबको बुलाया गया पर देर हो चुकी थी। अंतिम क्रिया के बाद निधि ने उनका कमरा बंद कर दिया। 49 दिन तक उसने उस ओर देखा भी नहीं।
49वें दिन पति ने कहा,“माँ का सामान समेट दो… गद्दा और कपड़े अलग रख देना।”
निधि ने कमरे का दरवाजा खोला। हल्की सीलन, दवाइयों की गंध, दीवार पर कृष्ण की तस्वीर और वही फूलों वाला कंबल… वह गद्दा हटाने लगी, तभी बीच का कपड़ा उभरा हुआ दिखा। उसने धागे खोले।
अंदर एक पीला पड़ा नोट था, “मेरी प्यारी निधि, अगर मैं तुम्हें पहचान न सकूँ तो माफ कर देना। तुम मेरी बहू नहीं, मेरी धन हो। मेरा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ।” -माँ
साथ ही एक मखमली थैली जिसमें वे गहने थे जिनको लेकर परिवार में हमेशा विवाद रहा। थैली में एक और नोट, “ये गहने मेरी बहू के हैं, जिसने मेरी आख़िरी साँस तक सेवा की। मेरी आत्मा हमेशा तुम्हें पहचानती थी।” -माँ
सबसे भीतर एक छोटी तिजोरी थी। उसमें ऊपरी मंजिल की रजिस्ट्री निधि के नाम और अंतिम पत्र, “निधि, तूने मेरे बुढ़ापे को बोझ नहीं बनने दिया। यह मकान नहीं, मैं अपना जीवन तुम्हारे नाम कर गई हूँ। खुश रहना, बेटी।”
निधि फूटकर रो पड़ी। पति ने उसका हाथ थामकर कहा, “तुमने माँ को जीवन दिया, और उन्होंने तुम्हें अपना सब कुछ।”
कहानी का संदेश: कभी-कभी जो हमें पहचान नहीं पाता, वह दिल से हमें सबसे अधिक पहचानता है। माँ-बेटी का रिश्ता खून से नहीं, भावनाओं से बनता है।
