■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएँ थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था। पुत्री की भावनाएँ समझते हुए राजा ने बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से कर दिया।
राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है। विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियाँ दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि ये रोटियाँ यहाँ क्यों रखी हैं।
संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियाँ अगले दिन के लिए रखी हैं। अगर कल भोजन न मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। यह सुनकर राजकुमारी हँस पड़ी। उसने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था क्योंकि उन्हें लगता था कि आप भी मेरी तरह वैरागी हैं पर आप तो भक्ति करते हैं और कल की चिंता भी करते हैं।
सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा रखता है। अगले दिन की चिंता तो पशु भी नहीं करते, हम तो मनुष्य हैं। अगर भगवान चाहेगा तो भोजन मिल जाएगा और यदि न भी मिले तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।
ये बातें सुनकर संन्यासी की आँखें खुल गईं। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने कहा कि आप राजा की बेटी होकर राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आ गईं, जबकि मैं पहले से ही फकीर था, फिर भी मुझे कल की चिंता सताती रही। केवल कह देने से कोई संन्यासी नहीं हो जाता, संन्यासी को जीवन में उतारना पड़ता है। आज आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।

प्रेरक प्रसंग