■ सूर्यकांत उपाध्याय

एक बार एक राजा राज्य के बाहर एक पेड़ के नीचे बैठे संत के पास पहुँचा। उसने पूछा, “हे स्वामी! क्या कोई ऐसी औषधि है जो अमरता दे सके? कृपया मुझे बताइए।”
संत ने कहा,”हे राजा! आपके सामने जो दो पर्वत दिखाई दे रहे हैं, उन्हें पार कीजिए। वहाँ एक झील मिलेगी। उस झील का पानी पीने से आप अमर हो जाएंगे।”
राजा ने पर्वत पार किए और झील तक पहुँचे। जैसे ही वह पानी पीने को झुके, उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी। आवाज का पीछा करने पर उन्होंने एक बूढ़े, कमजोर व्यक्ति को दर्द से कराहते हुए देखा।
राजा ने कारण पूछा तो उस व्यक्ति ने बताया,”मैंने इस झील का पानी पी लिया था और अमर हो गया। जब मेरी उम्र सौ वर्ष हुई, तब मेरे बेटे ने मुझे घर से निकाल दिया। पचास वर्षों से मैं यहाँ पड़ा हूँ, बिना किसी देखभाल के। मेरा बेटा मर चुका है और मेरे पोते अब बूढ़े हो चुके हैं। मैंने खाना-पीना भी छोड़ दिया, लेकिन फिर भी मैं मर नहीं सकता।”
यह सुनकर राजा विचार में पड़ गए— “बुढ़ापे के साथ अमरता का क्या अर्थ? यदि अमरता के साथ यौवन भी मिल सके तो?” वे वापस संत के पास गए और बोले,”कृपया मुझे ऐसा उपाय बताइए जिससे अमरता के साथ यौवन भी प्राप्त हो जाए।”
संत ने कहा, “झील पार करने के बाद आपको एक और पर्वत मिलेगा। उसे पार कीजिए। वहाँ एक पेड़ मिलेगा जिस पर पीले फल लगे होंगे। उन फलों में से एक खा लीजिए, और आपको अमरता के साथ यौवन भी प्राप्त हो जाएगा।”
राजा ने दूसरा पर्वत पार किया और पीले फलों से लदे पेड़ को देखा। जैसे ही उन्होंने फल तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, उन्हें तेज बहस और लड़ाई की आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने सोचा-“इस सुनसान जगह में कौन झगड़ सकता है?”
उन्होंने देखा कि चार युवक ऊँची आवाज में झगड़ रहे थे। राजा ने पूछा, “तुम लोग क्यों लड़ रहे हो?”
उनमें से एक बोला,”मैं 250 साल का हूँ, और मेरे दाहिने खड़े व्यक्ति की उम्र 300 साल है। यह मुझे मेरी संपत्ति का हिस्सा नहीं दे रहा।”
जब राजा ने दाहिने वाले व्यक्ति से पूछा, उसने कहा, “मेरा पिता, जो 350 साल का है, अभी भी जीवित है और उसने मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया। तो मैं अपने बेटे को कैसे दूँ?”
फिर उसने अपने पिता की ओर इशारा किया, जो 400 साल के थे और वही शिकायत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि इसी अंतहीन विवाद के कारण गांव वालों ने उन्हें गांव से निकाल दिया है।
यह देखकर राजा स्तब्ध रह गए। वे वापस संत के पास पहुँचे और बोले,
“धन्यवाद, आपने मुझे मृत्यु का महत्व समझा दिया।”
