
■ हिमांशु राज़
भारत आज एक ऐसे गंभीर संकट का सामना कर रहा है जो मानव जीवन, कृषि, उद्योग और पर्यावरण सभी के लिए खतरा पैदा कर रहा है जल संकट। यह संकट आने वाले दशकों में भारत की स्थिरता और विकास के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है। तेजी से बढ़ती जनसंख्या, जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित शहरीकरण और बिना योजना के औद्योगिकीकरण ने जल संसाधनों पर असहनीय दबाव डाला है। नदियों, झीलों और तालाबों जैसी पारंपरिक जल स्रोतों का अस्तित्व धीरे-धीरे कम हो रहा है, जबकि भूजल का अत्यधिक दोहन स्थिति को और भयावह बना रहा है।भारत में पिछले कुछ दशकों के दौरान प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में तेज गिरावट देखी गई है।
वर्ष 2001 में जहां यह औसतन 1816 घन मीटर थी, वहीं 2011 में घटकर 1545 घन मीटर रह गई। 2025 तक इसके 1434 घन मीटर और 2050 तक 1219 घन मीटर तक पहुंचने का अनुमान है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी देश में जब यह आंकड़ा 1700 घन मीटर से नीचे चला जाता है, तो वह ‘जल तनाव’ की श्रेणी में आता है। इस दृष्टि से भारत पहले ही गंभीर जल संकट के क्षेत्र में प्रवेश कर चुका है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 60 करोड़ भारतीय आज उच्च या अत्यधिक जल संकट की स्थिति से गुजर रहे हैं, जबकि 21 प्रमुख शहर निकट भविष्य में अपनी भूजल आपूर्ति खोने की कगार पर हैं।
भूजल स्तर में गिरावट इस संकट का सबसे बड़ा कारण है। कृषि प्रधान राज्यों पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सिंचाई के लिए भूजल पर अत्याधिक निर्भरता ने प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ दिया है। ट्यूबवेलों के अत्यधिक उपयोग ने जलस्तर को खतरनाक रूप से नीचे धकेल दिया है। सिर्फ ग्रामीण इलाकों में ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी अनियंत्रित निर्माण और बढ़ती जनसंख्या के कारण भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। इसके साथ ही, नदी और झीलों में औद्योगिक रासायनिक अपशिष्ट और घरेलू नालों का प्रदूषित जल मिलाने से शुद्ध जल की उपलब्धता लगातार घट रही है। इस संकट के समाधान के रूप में वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) एक महत्वपूर्ण विकल्प बनकर उभरा है। यह पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का संगम है। वर्षा के पानी को एकत्र कर उसे भूमिगत जल स्तर में पुनर्भरण की प्रक्रिया न केवल जल उपलब्धता को बढ़ाती है बल्कि भविष्य के लिए भी जल सुरक्षा सुनिश्चित करती है।

भारत की प्राचीन जल संचयन परंपराएं जोहड़, बावड़ी, टैंक, तालाब और कुंड इस दिशा में प्रेरणादायक उदाहरण हैं। आज आवश्यकता है कि इन पारंपरिक व्यवस्थाओं को आधुनिक तकनीक से जोड़ते हुए पुनर्जीवित किया जाए। भवन निर्माण में वर्षा जल संचयन को अनिवार्य किया जाना एक सराहनीय कदम है जिसे देशभर में प्रभावी रूप से लागू करने की जरूरत है।
सरकार ने ‘अटल भूजल योजना’, ‘जल शक्ति अभियान’ और ‘कैच द रेन’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए हैं ताकि जल संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जा सके। परंतु जल संकट का समाधान केवल नीतियों या सरकारी योजनाओं से संभव नहीं होगा। इसमें प्रत्येक नागरिक की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। किसानों को माइक्रो-इरिगेशन, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी जल-कुशल तकनीकों को अपनाना चाहिए तथा फसल चक्र में बदलाव कर जल पर निर्भरता घटानी चाहिए। उद्योगों को जल पुनः उपयोग, अपशिष्ट जल उपचार और रिसाइक्लिंग को अपने उत्पादन चक्र का हिस्सा बनाना होगा। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में जल अपव्यय रोकने के लिए पाइपलाइन मरम्मत, जल मीटरिंग और पुनः उपयोग प्रणाली को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
जल संकट का समाधान केवल पानी बचाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक समग्र जल प्रबंधन व्यवस्था का निर्माण है जिससे जल का न्यायसंगत और सतत वितरण सुनिश्चित किया जा सके। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से निपटने के लिए जल संसाधनों का संरक्षण, पुनर्भरण और बुद्धिमान उपयोग आवश्यक है। शिक्षा और जनजागरूकता भी इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। जब तक हर नागरिक यह नहीं समझता कि जल एक सीमित और अमूल्य संसाधन है, तब तक कोई नीति या तकनीक कारगर नहीं हो सकती।अंततः यह समझना आवश्यक है कि जल संकट केवल सरकार या किसी संस्था का विषय नहीं बल्कि हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
घर-घर में जल संरक्षण की भावना फैलाना, पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करना और आधुनिक प्रौद्योगिकी को अपनाना ही वह मार्ग है जिससे भारत इस संकट से उबर सकता है। जल केवल आज की आवश्यकता नहीं बल्कि आने वाले कल के अस्तित्व का आधार है। उसका विवेकपूर्ण उपयोग ही इस अमूल्य संसाधन को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकता है।
